अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच सुरक्षा समझौते पर सहमति बनी। जानिए क्या अब अमेरिका का सैन्य तौर पर ग्रीनलैंड का नियंत्रण होगा या डेनमार्क ने डील के जरिए ट्रंप की चाहतों पर लगाम लगा दी।
अमेरिका और डेनमार्क के बीच अंटार्कटिक में मौजूद ग्रीनलैंड को लेकर एक समझौते पर सहमति बन गई है। बीते करीब डेढ़ साल से लगातार ग्रीनलैंड पर कभी कब्जे की धमकी देने तो कभी डेनमार्क पर इसे अमेरिका को बेचने का दबाव बनाने के बाद अब ट्रंप की इस द्वीप-देश को लेकर एक हसरत पूरी होती दिख रही है। इसे लेकर ट्रंप ने अपने प्लेटफॉर्म- ट्रूथ सोशल पर पोस्ट कर कहा कि डील से अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा और अन्य जरूरतों का स्थायी नियंत्रण मिल जाएगा। वहीं, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने भी इस समझौते को क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत करने के लिए अहम बताया।
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किसी भी पक्ष ने इस समझौते की आंतरिक बातों का खुलासा नहीं किया। हालांकि, यह समझौता उतना भी आसान नहीं है, जितना डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से बताया गया है। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-डेनमार्क के बीच हालिया समय में क्या त्रिपक्षीय समझौता हुआ है? कैसे डेनमार्क ने ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर तमाम चाहतों को किनारे करते हुए यह समझौता किया है? ग्रीनलैंड रणनीतिक तौर पर कितना अहम है? आइये जानते हैं...
ग्रीनलैंड को लेकर क्या हुआ है त्रिपक्षीय समझौता?
अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर एक समझौते पर सहमति बनी है। इस समझौते पर संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए जाने की संभावना है। इस समझौते के तहत अमेरिका को इस द्वीप-देश के लिए कुछ अधिकार और छूट दी गई हैं...
अमेरिका-ग्रीनलैंड और डेनमार्क के बीच समझौता।
- फोटो : अमर उजाला
इसके अलावा तीनों पक्षों के समझौते के बाद अब ह तय कर दिया गया है कि अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी देश, जैसे- रूस और चीन ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश नहीं कर पाएंगे।
क्या ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप जो चाहते थे उसमें सफल हुए?
ग्रीनलैंड को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की जिस तरह की चाहत थी और इस समझौते के नतीजों को देखें तो उन्हें कुछ सफलताएं और काफी नाकामियां भी मिली हैं।
अमेरिका-डेनमार्क-ग्रीनलैंड का समझौता।
- फोटो : अमर उजाला
क्या रही ग्रीनलैंड पर ट्रंप की आंशिक सफलता?
अमेरिका को ग्रीनलैंड में स्थायी सैन्य पहुंच, सैन्य ठिकाने बनाने और हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल के अधिकार मिले हैं। इसे सुरक्षा प्राथमिकताओं के मामले में ट्रंप की उपलब्धि माना जा रहा है।
चीन-रूस जैसे अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों के ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने बनाने और दुर्लभ खनिजों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश करने पर पूरी तरह रोक लगाने को भी ट्रंप की जीत के तौर पर देखा जा रहा है।
समझौते से पहले ग्रीनलैंड में कितना रहा अमेरिका का दखल, अब क्या बदलेगा?
1941: दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुए समझौते के तहत अमेरिका को डेनमार्क की संप्रभुता को स्वीकार करते हुए ग्रीनलैंड में हवाई क्षेत्र और रक्षा ठिकाने स्थापित करने की अनुमति मिली थी।
1951: अमेरिका और डेनमार्क के बीच हुए सुरक्षा समझौते ने अमेरिकी सेना को पूरे ग्रीनलैंड में जमीन, समुद्र और वायु मार्ग से स्वतंत्र आवाजाही और रक्षा क्षेत्र स्थापित करने की व्यापक सैन्य पहुंच दी।
2004: एक अपडेट के तहत पितुफिक (पूर्व में थ्युल एयर बेस) को अमेरिका के मुख्य रक्षा क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया। यहां अमेरिका और नाटो का मिसाइल अर्ली-वार्निंग रडार सिस्टम स्थित है, जिसका इस्तेमाल मिसाइल खतरों का पता लगाने और आर्कटिक गतिविधियों की निगरानी के लिए किया जाता है।
रॉयल डैनिश डिफेंस कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर पीटर विगो याकोबसेन और अन्य विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप की ओर से स्थायी नियंत्रण का दावा जमीनी हकीकत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। अमेरिका के पास 1951 के रक्षा समझौते के समय से ही ग्रीनलैंड में व्यापक सैन्य पहुंच और अधिकार, जैसे थ्युल स्पेस बेस पहले से मौजूद थे।
ग्रीनलैंड रणनीतिक तौर पर कितना अहम है?
अमेरिका के लिए क्यों अहम है ग्रीनलैंड।
- फोटो : अमर उजाला
क्या त्रिपक्षीय समझौते से पहले ग्रीनलैंड पर वास्तव में खतरा था?
पीटर विगो याकोबसन के मुताबिक, ग्रीनलैंड के आसपास चीनी और रूसी जहाजों के खतरे के ट्रंप के दावे वास्तविक नहीं हैं। चीन आर्कटिक में युद्धपोत या पनडुब्बियां संचालित नहीं करता है और रूस की पनडुब्बियां भी केवल कभी-कभार ही इस क्षेत्र के पास आती हैं; इसलिए ग्रीनलैंड को लेकर कोई तत्काल सुरक्षा खतरा मौजूद नहीं था।
अमेरिका-डेनमार्क-ग्रीनलैंड का समझौता।
- फोटो : अमर उजाला
विश्लेषकों का मानना है कि इस नए समझौते से मुख्य बदलाव यह हुआ है कि अमेरिकी सैन्य अधिकार अब स्थायी हो गए हैं और प्रतिद्वंद्वी देशों के निवेश पर औपचारिक रोक लग गई है। यूरोपीय अधिकारियों और विश्लेषकों ने राहत की सांस ली है, क्योंकि ग्रीनलैंड की सीमाएं और संप्रभुता सुरक्षित रही हैं।