अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की शिखर वार्ता ने रूस और चीन के बीच गहरा रहे संबंधों की तरफ भी दुनिया का ध्यान खींचा है। वार्ता से ठीक पहले दोनों देशों ने अपने संबंधों को ‘अटूट’ बताया। विश्लेषकों का कहना है कि इसके पीछे रूस और चीन की मंशा अमेरिका को यह संदेश देने की थी कि पुतिन दुनिया में उभर रही एक धुरी के नुमाइंदे के रूप में जिनेवा वार्ता में जा रहे हैं।
बीते सोमवार को एनबीसी चैनल पर पुतिन के साथ पूरा इंटरव्यू प्रसारित हुआ था। उसमें पुतिन ने लगभग हर मुद्दे पर चीन का बचाव किया। कहा कि दोनों देशों के संबंध इस समय ‘अभूतपूर्व ऊंचे स्तर पर’ हैं। पुतिन ने कहा- ‘चीन एक दोस्त देश हैं। उसने हमें अपना दुश्मन घोषित नहीं किया है, जैसा कि अमेरिका ने किया है।’ इन टिप्पणियों का जवाब चीन ने और भी ज्यादा दोस्ताना जताते हुए दिया। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा- ‘चीन और रूस के सहयोग की सीमा आसमान है। दोनों देश किसी पहाड़ की तरह एकजुट खड़े हैं, दोस्ती अटूट है।’
अमेरिकी विश्लेषकों ने कहा है कि पश्चिमी देशों से बिगड़ते संबंधों के बीच रूस और चीन एक दूसरे के ज्यादा करीब आ गए हैं। उन्होंने एक धुरी बना ली है। दुनिया की दूसरी सबसे अर्थव्यवस्था चीन का साथ मिलने से रूस को 2014 में यूक्रेन के इलाके क्राइमिया को अपने देश में मिला लेने में मदद मिली। उधर चीन के लिए ये अच्छी बात है कि जिस समय अमेरिका से उसका टकराव बढ़ा है, उसे एक बड़ी सैनिक शक्ति रूस का साथ मिल गया है।
टीवी चैनल सीएनएन के टीकाकारों नेक्टर गैन और वेन वेस्टकॉट ने चैनल की वेबसाइट पर लिखा है- ‘रूस और चीन के रणनीतिक संबंधों के बीच अर्थव्यवस्था का केंद्रीय स्थान रहा है। दोनों देशों के बीच दोतरफा व्यापार 2018 में 100 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया। 2024 तक उन्होंने इसे दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। दोनों देश ऊर्जा के क्षेत्र में भी अपना सहयोग बढ़ा रहे हैं। इसमें रूस से चीन को प्राकृतिक गैस सप्लाई करने के लिए हुआ 400 अरब डॉलर का सौदा और चीन के कई परमाणु संयंत्रों को रूसी मदद भी शामिल है। रूस चीन के लिए हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर भी बन गया है। 2014 से 2018 के बीच चीन ने अपने 70 फीसदी हथियारों का आयात रूस से ही किया।’
इस गहराते संबंध का ही नतीजा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस और चीन और ने अहम मसलों पर एक दूसरे का साथ दिया है। इनमें मानवाधिकार हनन के मसले भी शामिल हैं। लेकिन अमेरिकी विश्लेषकों की राय है कि गहराते संबंधों के बावजूद आने वाले समय में रूस और चीन के बीच टकराव पैदा हो सकता है। इसकी एक बड़ी वजह तो यही है कि दोनों देशों का व्यापार संबंध असंतुलित है। रूस चीन को प्राकृतिक संसाधन और कच्चे माल की सप्लाई करता है, जबकि चीन उसे कारखाना में उत्पादित वस्तुओं का निर्यात करता है। इससे रूस का व्यापार घाटा बढ़ा है।
चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना से मध्य एशिया में चीन का प्रभाव बहुत बढ़ गया है। जबकि परंपरागत रूप से रूस इसे अपना प्रभाव क्षेत्र मानता रहा है। ऐसे संकेत हैं कि उस इलाके में चीन के बढ़ रहे निवेश और दखल से रूस की चिंताएं बढ़ी हैं। अमेरिकी विश्लेषकों की राय है कि दोनों देशों में हाल में गहराए संबंधों के पीछे भू-राजनीतिक और आर्थिक सुविधाएं हैं। लेकिन इससे उनके बीच लंबे समय से बने रहे संदेहों का निवारण नहीं हुआ है। उनके बीच उसूलों और विचारधारा की एकता भी नहीं है। इसलिए मुमकिन है कि फिलहाल अटूट दिख रहे संबंधों में भविष्य में दरार पड़ने लगे।