जैश-ए-मोहम्मद आतंकी समूह को मसूद अजहर और मुफ्ती शमजई ने संयुक्त रूप से साल 2000 में बिनोरिया मदरसा में बनाया था। मुफ्ती शमजई की हत्या के बाद सभी जिहादी कैडर जैश-ए-मोहम्मद में भर्ती हो गए, जिसे अजर अपने परिवार के करीबी सदस्यों के जरिए चलाता था।
रऊफ असगर के पास आतंकवादी समूह के रोजमर्रा के काम की जिम्मेदारी है। इसका दूसरा भाई तलहा सैफ, जैश की छात्र इकाई, अल मुराबितून का प्रमुख है। बालाकोट हवाई हमले में मारा गया अजहर का साला यूसुफ अजहर जैश के आतंकियों के प्रशिक्षण के लिए जिम्मेदार था।
बड़ा भाई इब्राहिम अजहर समूह का परिचालन प्रमुख है। उसका दूसरा साला अशफाक अहमद अल रहमत ट्रस्ट का मुख्य समन्वयक है, जो इस्लामिक जिहादी समूह का तथाकथित चैरिटी ट्रस्ट है।
इकट्ठा किए गए सबूतों के मुताबिक मसूद अजहर न सिर्फ आग उगलने वाले भाषण देने में माहिर है, बल्कि जब से उसे हरकत की सदा-ए-मुजाहिद पत्रिका का संपादक नियुक्त किया गया, तब से इस्लामिक जिहाद का प्रबल प्रवक्ता भी है। उसकी लिखी किताब 'द वर्चुस ऑफ जिहाद', युवा जिहादियों के लिए एक मानक पाठ्यपुस्तक है और इसे उपमहाद्वीप में बड़े पैमाने पर प्रसारित किया जाता है।
1990 के दशक की शुरुआत में सोमालिया, सऊदी अरब, यूएई, जाम्बिया और ब्रिटेन में जिहाद का प्रचार करने के बाद, अजहर ने 1999 में अपनी रिहाई के बाद भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य पर अपना ध्यान केंद्रित किया। उसने अक्टूबर 2001 के कश्मीर विधानसभा हमले और फिर दिसंबर 2001 के संसद हमले की साजिश रची। जिसके कारण भारत और पाकिस्तान के बीच लगभग युद्ध जैसे हालात बन गए।
2001 के हमलों के बाद दबाव पड़ने पर अजहर ने दिसंबर 2003 में दो आत्मघाती बम हमलों में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को निशाना बनाने का दुस्साहस किया था। उसने 2013 के संसद हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी की सजा के बाद भारत पर छह बड़े हमलों को अंजाम दिया और अपनी गतिविधियों को आगे बढ़ाया। अब इन सबके बाद पुलवामा का आत्मघाती हमला हुआ है।