अफगानिस्तान में सर्दी का मौसम आने के साथ लोगों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। देश में काम करने वाली गैर-सरकारी सहायता एजेंसियों का कहना है कि बड़ी मानवीय त्रासदी टालने के लिए तुरंत बड़े पैमाने पर मदद की जरूरत है। लेकिन उनका आरोप है कि पश्चिमी देश, चीन, और रूस अफगान लोगों की मुसीबत को बढ़ाने में योगदान कर रहे हैं।
इतनी भयावह स्थिति के बावजूद इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, चीन या रूस अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के प्रति अपनी नीति बदलने पर किसी तरह का विचार कर रहे हैं। चीन और रूस लगातार यही कह रहे हैं कि अफगानिस्तान में मदद पहुंचाना पश्चिमी देशों- खास कर अमेरिका की जिम्मेदारी है। उनका कहना है कि अफगानिस्तान में मौजूदा हालात पश्चिमी देशों के सैनिक हस्तक्षेप की वजह से पैदा हुए हैं। इसलिए इसे संभालना भी उनकी ही जिम्मेदारी है।
जबकि पर्यवेक्षकों का कहना है कि भौगोलिक रूप से रूस और चीन दोनों अफगानिस्तान करीब हैं। इसलिए वे चाहें तो तुरंत सहायता पहुंचा सकते हैं। वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपे एक विश्लेषण में चेतावनी दी गई है कि ऐसा ना करके चीन और रूस अपने लिए खतरा मोल ले रहे हैं। इसके मुताबिक अगर अफगानिस्तान में मानवीय त्रासदी गहरी हुई, तो इन दोनों देशों को ही सबसे पहले शरणार्थी समस्या का सामना करना पड़ेगा।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि चीन और रूस दोनों ने तालिबान के साथ कूटनीतिक संपर्क बना रखे हैं। इसके बावजूद उन्होंने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है। इसकी वजह उनका अपना रणनीतिक जोड़-घटाव है। बताया जाता है कि चीन और रूस दोनों अफगानिस्तान में हक्कानी गुट के बढ़ते प्रभाव से चिंतित हैं। उन्हें शक है कि हक्कानी गुट का आईएसआईएस-खुरासान और दूसरे इस्लामी चरमपंथी गुटों के साथ संबंध है। जबकि इस्लामी चरमपंथी गुट रूस और चीन दोनों के लिए चिंता की वजह हैं। चीन को खास चिंता ईस्ट तुर्कमिनिस्तान इस्लामी मूवमेंट (ईटीआईएम) नाम के गुट से है, जो अतीत में चीन के प्रांत शिनजियांग में आतंकवादी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार रहा है।