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एक्सप्लेनर: जिस यूके के टूटने की चर्चाएं, वह कैसे पड़ोसियों का खून बहाकर एकजुट रहा; क्या है 800 साल का इतिहास?

Tue, 15 Sep 2026 06:04 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

ब्रिटेन में जारी इस स्वतंत्रता के वाद-विवाद के बीच सबसे पहले यह जानना अहम है कि आखिर यह यूनाइटेड किंगडम (यूके) क्या है, जिसके टूटने की चर्चाएं तेज हो गई हैं? कैसे यह अस्तित्व में आया और इसका इतिहास कितना पुराना है? आइये जानते हैं...
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यूके के निर्माण का इतिहास। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूनाइटेड किंगडम (यूके), जिसे भारत में प्रचलित तौर पर ब्रिटेन कह कर संबोधित किया जाता है, के लिए आने वाले दिन काफी मुश्किल भरे हो सकते हैं। दरअसल, इसकी पहली झलक सोमवार को मिली है। हुआ कुछ यूं कि यूके में शामिल चार देशों में से तीन देश- वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड के राष्ट्रप्रमुखों ने साथ में बैठक कर 'स्व-निर्णय' (सेल्फ डिटरमिनेशन) का अधिकार लेने से जुड़ा घोषणापत्र जारी किया है। इसका मतलब यह है कि अब तीनों ही देश अपनी खुद की पहचान ब्रिटेन से अलग स्थापित करने पर जोर दे रहे हैं। कई हलकों में तो यह भी कहा जा रहा है कि यह तीनों देश अब खुद को ब्रिटेन की सांविधानिक प्रणाली से अलग कर अपने अलग संविधान और कानून के हिसाब से चलना चाह रहे हैं। यानी ब्रिटेन से पूरी तरह स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं।
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ब्रिटेन में जारी इस स्वतंत्रता के वाद-विवाद के बीच सबसे पहले यह जानना अहम है कि आखिर यह यूनाइटेड किंगडम (यूके) क्या है, जिसके टूटने की चर्चाएं तेज हो गई हैं? कैसे यह अस्तित्व में आया और इसका इतिहास कितना पुराना है? यूके में शामिल देशों की व्यवस्था क्या है और इस पर विवाद क्यों पैदा हो रहा है? आइये जानते हैं...

पहले जानें- क्या है यूनाइटेड किंगडम?

यूनाइटेड किंगडम (यूके) असल में कोई देश नहीं है। यह चार देशों से मिलकर बना एक 'देशों का समूह' है। इसे एक-दूसरे के करीब मौजूद- इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड मिलकर बनाते हैं। इसे कई बार यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड नॉर्दर्न आयरलैंड के नाम से जाना जाता है। 

ये भी पढ़ें: कभी भारत को तोड़ा था अब खुद टूटेगा ब्रिटेन: एक साथ आए स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड, एमओयू पर किया साइन

यूनाइटेड किंगडम। - फोटो : अमर उजाला

कैसे अस्तित्व में आया यूनाइटेड किंगडम?

यूनाइटेड किंगडम का गठन कोई एक दिन की घटना नहीं थी, बल्कि यह इंग्लैंड के दुनियाभर में बढ़ते दायरे, सैन्य जीत, अलग-अलग राजवंशों के साथ आने और राजनीतिक समझौतों के लंबे ऐतिहासिक घटनाक्रमों का नतीजा था। मोटे तौर पर यूनाइटेड किंगडम के इतिहास को पांच हिस्सों में समझा जा सकता है। 

यूके, ग्रेट ब्रिटेन, ब्रिटेन और इंग्लैंड। - फोटो : अमर उजाला

वेल्स पर इंग्लैंड के कब्जे की क्या कहानी?

  • 13वीं शताब्दी के अंत में इंग्लैंड के किंग एडवर्ड-प्रथम ने वेल्स, जिसे उस वक्त प्रिंसिपैलिटी ऑफ वेल्स कहा जाता था, पर सेना से हमला करवाकर कर उस पर कब्जा कर लिया और अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया। चूंकि ब्रिटेन उस दौर की तेजी से उभरती ताकत थी, इसलिए वेल्स पर कब्जे को मान्यता मिलती चली गई।
  • हालांकि, वेल्स में बागियों के एक संगठन ने इंग्लैंड के इस कब्जे के खिलाफ युद्ध छेड़ा। भड़के एडवर्ड ने उस दौरान वेल्स में जमकर हमले करवाए और खून बहाया। एक प्रचलित घटना यह है कि वेल्स के राजा- ल्यूवलिन, जिनसे सत्ता छीनकर एडवर्ड प्रथम ने वेल्स पर कब्जा किया था, उन्हें ब्रिटिश सेना ने घेरकर मार दिया था। एक अंग्रेज सैनिक ने ल्यूवलिन की हत्या के बाद मौत की पुष्टि के लिए उनका कटा हुआ सिर इंग्लैंड भेजा था। 
  • आखिरकार 1274 में शुरू हुए खूनी संघर्ष का अंत 10 साल बाद 1284 में हुआ, जब वेल्स ने हथियार डाल दिए और जमीन के मामलों को छोड़कर बाकी सभी मामलों में अंग्रेजी कानून को मान्यता दे दी। 
  • बाद में किंग हेनरी-आठवें के शासन में इंग्लैंड की संसद ने 1530 और 1540 के दशक में 'एक्ट्स ऑफ यूनियन' कानून पारित किए। इसके तहत अंग्रेजों के कानूनों और प्रशासनिक नियमों को वेल्स पर जबरन लागू कर दिया गया। इससे वेल्स को औपचारिक रूप से इंग्लैंड का हिस्सा माना जाने लगा। 

वेल्स पर इंग्लैंड के कब्जे का इतिहास। - फोटो : अमर उजाला

स्कॉटलैंड में मध्यस्थता का किया बहाना, इरादा- गद्दी पर कब्जा जमाना

13वीं सदी तक स्कॉटलैंड एक स्वतंत्र देश के तौर पर स्थापित था। हालांकि, 13वीं सदी के अंत में यहां के राजशाही शासन में विवाद की स्थिति पैदा हो गई और राजगद्दी को लेकर जंग के बीच गृहयुद्ध शुरू हो गया। इस विवाद के निपटारे के लिए स्कॉटलैंड ने इंग्लैंड के तत्कालीन शासक एडवर्ड-प्रथम पर विश्वास जताते हुए उन्हें मध्यस्थता करने को कहा। हालांकि, एडवर्ड ने इसे अपने फायदे का मौका बनाया और स्कॉटलैंड को अपने अधीन करने का प्रस्ताव दे दिया। हालांकि, स्कॉटिश नागरिकों को यह प्रस्ताव पसंद नहीं आया। 

इसके बाद इंग्लैंड के शासक ने चालाकी से राजगद्दी को लेकर पैदा हुए विवाद को और भड़काया। चूंकि उनके पास इस विवाद में मध्यस्थता करने का अधिकार अभी भी था, ऐसे में उनकी तरफ से राजगद्दी के दावेदारों को अपनी तरफ करने की कोशिश हुई। जैसे ही राजगद्दी के एक दावेदार- ब्रूस ने गुपचुप तरीके से एडवर्ड का साथ लेने पर सहमति जतायी, एडवर्ड ने अपनी मध्यस्थता का गलत फायदा भी उन्हें ही पहुंचाया। इस तरह ब्रूस को स्कॉटलैंड के राजा की गद्दी मिली और उन्होंने तुरंत ही स्कॉटलैंड पर इंग्लैंड के किंग एडवर्ड-प्रथम का आधिपत्य मान लिया। 

हालांकि, एडवर्ड ने आगे के कुछ वर्षों में स्कॉटलैंड के आंतरिक मामलों में दखल देना शुरू कर दिया। उन्होंने स्कॉटलैंड से टैक्स लेना शुरू किया और कानूनी मामलों में हस्तक्षेप किया। इतना ही नहीं इंग्लैंड के युद्ध में भी स्कॉटलैंड से सैनिकों को भेजने की मांग की गई। जब स्कॉटलैंड में नेतृत्व परिवर्तन हुआ तो इंग्लैंड का जबरदस्त विरोध हुआ। आखिरकार स्कॉटलैंड ने इंग्लैंड के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की और अंग्रेजी शासन के दमन के खिलाफ जाते हुए इंग्लैंड के दुश्मन फ्रांस से हाथ मिला लिया। 

राजा एडवर्ड प्रथम के लिए यह मौका स्कॉटलैंड पर कब्जा करने का बहाना बन गया। उन्होंने अंग्रेजी सैनिकों को भेजकर बेरविक शहर को तबाह कर दिया, जो कि लंदन के बाद सबसे अहम आर्थिक क्षेत्र हुआ करता था। एडवर्ड की सेनाओं ने स्कॉटलैंड के अंदर रक्तपात मचाया और तकरीबन 7500 पुरुष-महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया। इंग्लैंड की सेना का दमन यहीं नहीं रुका, अगले कुछ वर्षों में जब स्कॉटिश नागरिकों ने पलटवार किया तो इंग्लैंड ने फिर हमले बोले और हजारों और लोगों की जान ले ली। इस तरह इंग्लैंड ने अलग-अलग मौकों पर संघर्ष और युद्ध में स्कॉटलैंड के नागरिकों का खून बहाकर अपना कब्जा बरकरार रखा। 

हालांकि, इस कब्जे के बावजूद अगले कुछ वर्षों में जब स्कॉटलैंड ने इंग्लैंड के कब्जे के खिलाफ जंग जारी रखी और उसकी सेना को भारी नुकसान पहुंचाते हुए 14वीं सदी की शुरुआत में अपनी स्वतंत्रता का एलान कर दिया तो उन्हें ईसाई धर्मगुरु पोप जॉन-XXII का समर्थन मिला। चूंकि इंग्लैंड ईसाई धर्म का केंद्र माना जाता था, इसलिए पोप के इस फैसले और अपनी सेना को एक अंतहीन संघर्ष से बचाने के लिए इंग्लैंड के शासन ने स्कॉटलैंड की कानूनी स्वायत्तता को मान लिया। यानी स्कॉटलैंड पर शासन ब्रिटेन का ही रहा, लेकिन उसकी कानूनी व्यवस्था स्कॉटिश नागरिकों के हवाले कर दी गई।

स्कॉटलैंड पर इंग्लैंड के कब्जे का इतिहास। - फोटो : अमर उजाला
अगले कुछ वर्षों में इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बीच तनाव की स्थितियां आईं। हालांकि, दोनों देशों की राजशाही का मेलजोल पारिवारिक स्तर तक बढ़ा। 16वीं सदी में स्कॉटलैंड के राजा जेम्स चतुर्थ का विवाह ब्रिटेन के राजा हेनरी सप्तम की बेटी से हुआ और इंग्लैंड की राजगद्दी पर स्कॉटलैंड के राजपरिवार का भी दावा पैदा हुआ। आखिरकार साल 1603 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम के निधन के बाद स्कॉटलैंड के राजा जेम्स षष्ठम को इंग्लैंड के राजा बनने का मौका मिला। उन्हें जेम्स-प्रथम के नाम से जाना जाता है। इससे दोनों देशों का राजा एक ही हो गया, हालांकि, इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की संसदें अलग-अलग रहीं।

1707 वह साल था, जब दोनों देशों की संसदों ने 'एक्ट ऑफ यूनियन' पारित किया। इससे इंग्लैंड और स्कॉटलैंड मिलकर ग्रेट ब्रिटेन नाम से एक नए राज्य के रूप में एकजुट हुए। इसकी मुख्य वजह यह थी कि अमेरिका में औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित करने की असफल कोशिशों के बाद स्कॉटलैंड भारी कर्ज में डूब चुका था। इंग्लैंड ने उसका कर्ज चुकाने में आर्थिक मदद दी। इसके अलावा, फ्रांस के साथ स्कॉटलैंड के संभावित गठबंधन को रोकने के राजनीतिक कारणों से भी यह संघ बना।

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ईसाई धर्म के दो धड़ों में विवाद बना आयरलैंड के एक हिस्से के ब्रिटेन में जाने की वजह

आयरलैंड के बारे में एक खास बात यह है कि यह इंग्लैंड से जमीनी तौर पर नहीं जुड़ा है। इसके बावजूद अपने पड़ोस में मौजूद इस देश पर इंग्लैंड ने 12वीं सदी में ही तैयारी कर ली। आयरलैंड पर इंग्लैंड का पहला हमला 1167 के दौर में आया। 1171 में इंग्लैंड के राजा हेनरी द्वितीय ने एक बड़ी सेना के साथ आयरलैंड पर आक्रमण किया और 1175 तक द्वीप के अधिकतर हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसी बीच अंग्रेज पोप एड्रियन IV ने हेनरी द्वितीय को लॉर्ड ऑफ आयरलैंड की उपाधि दे दी। यह कदम यह दर्शाता था कि आयरलैंड पर इंग्लैंड का शासन हो गया। इंग्लैंड ने भी इस द्वीप में डबलिन को अपनी सत्ता का मुख्य केंद्र बनाना शुरू कर दिया।

1542 में इंग्लैंड के राजा हेनरी अष्टम के शासनकाल में क्राउन ऑफ आयरलैंड एक्ट पारित किया गया। इसके तहत आयरलैंड को इंग्लैंड का एक आश्रित राज्य घोषित किया गया और इंग्लैंड के राजा को ही आयरलैंड का औपचारिक राजा बना दिया गया।

1801 में 'एक्ट्स ऑफ यूनियन' लागू हुआ, जिसके जरिये ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड का औपचारिक विलय करके यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड की स्थापना की गई। हालांकि, यह विलय शुरू से ही विवादास्पद रहा। दरअसल, इंग्लैंड का एक बड़ा हिस्सा उस वक्त ईसाई धर्म की प्रोटेस्टेंट शाखा के प्रभाव वाला था, जो कि ईसाई धर्म के पारंपरिक विचारधारा वाली कैथोलिक शाखा से अलग है। 

आयरलैंड के बंटने की कहानी। - फोटो : अमर उजाला
आयरलैंड में भी ईसाई आबादी बंटी हुई थी। आयरलैंड के अधिकतम हिस्सों में कैथोलिक ईसाइयों (पारंपरिक ईसाई विचारधारा को मानने वाले) की बहुलता थी, जबकि प्रोटेस्टेंट के तौर पर थे। कैथोलिक समुदाय यूके से अलग स्वतंत्र आयरलैंड का पक्षधर रहा है, जबकि अल्पसंख्यक प्रोटेस्टेंट समुदाय यूनाइटेड किंगडम के साथ रहने की वकालत करता है। 
इस तरह आयरलैंड की बहुसंख्यक कैथोलिक आबादी ने खुद को ब्रिटिश नहीं माना और लंदन के शासन को एक विदेशी औपनिवेशिक नियंत्रण की तरह देखा।

नतीजतन अगले कुछ साल तक इंग्लैंड के शासन में रहने के बाद आयरलैंड ने बगावत कर दी। 1918 के चुनाव में राष्ट्रवादी पार्टी सिन फेन की जीत के बाद, उसके सांसदों ने लंदन जाने के बजाय 1919 में डबलिन में अपनी अलग संसद की घोषणा की। इसके बाद आयरिश रिपब्लिकन आर्मी (आईआरए) और ब्रिटेन के बीच स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ, जो 1921 तक चला। 
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ब्रिटिश सरकार को जब लगने लगा कि आयरलैंड एकजुट होकर बेहद मजबूत है तो उसने गवर्मेंट ऑफ आयरलैंड एक्ट 1920 और 1921 की आंग्ला-आयरिश संधि के तहत द्वीप को दो भागों में विभाजित कर दिया- कैथोलिक बहुल 26 काउंटियों वाला दक्षिणी आयरलैंड और प्रोटेस्टेंट बहुल छह काउंटियों वाला उत्तरी आयरलैंड। 1922 में दक्षिणी भाग आजाद आयरिश स्टेट बना, जो 1949 में पूरी तरह स्वतंत्र रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के नाम से जाना गया। हालांकि, उत्तर-पूर्व में प्रोटेस्टेंट बहुल उत्तरी आयरलैंड यूके का ही हिस्सा बना रहा। इसके बाद देश का आधिकारिक नाम 'यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड नॉर्दर्न आयरलैंड पड़ा, जिसे आज यूनाइटेड किंगडम के प्रचलित नाम से जाना जाता है।
 
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