अन्य खतरों का जिक्र करते हुए उन्होंने इस्राइल द्वारा गाजा की सीमा की नाकेबंदी और गाजा में विभिन्न फलस्तीनी गुटों के बीच जारी मतभेदों की स्थिति भी हालात की गंभीरता की आग में घी का काम कर रही है।
उनका कहना था संयुक्त राष्ट्र ने पिछले करीब डेढ़ वर्ष के दौरान तनाव को दूर करने और भड़काव को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं लेकिन वित्तीय संसाधनों की किल्लत,फलस्तीनी नेताओं की प्रतिबद्धताओं और इस्राइल द्वारा उठाए जा रहे कदमों की वजह से वो कदम काफी साबित नहीं हुए हैं।
उन्होंने दलील देते हुए कहा कि दीर्घकालीन समाधान राजनैतिक ही हो सकता है और इस्राइल नाकेबंदी की ऐसी नीतियाँ जारी नहीं रख सकता जिससे विकास का गला घुटता है, दूसरी तरफ फलस्तीनी नेता भी अपनी आंतरिक राजनैतिक मतभेदों की स्थिति के खतरनाक नतीजों को नजरअंदाज करना जारी नहीं रख सकते।
विशेष दूत ने सुरक्षा परिषद को याद दिलाते हुए कहा कि उसका अंतिम लक्ष्य "फलस्तीनियों को कब्जे से मुक्त माहौल में प्रगति करने, और इस्राइल को भी सुरक्षा के माहौल में रहने का माहौल तैयार करने में मदद करना है, ऐसा माहौल जहां आतंक व रॉकेट हमलों का डर ना हो।
महिलाओं पर सबसे ज्यादा असर
एक इस्राइली मानवाधिकार संगठन गिशा की डायरेक्टर तानया हैरी ने स्थिति का विश्लेषण करने वाली एक रिपोर्ट सुरक्षा परिषद के सदस्यों को सौंपी। इसमें गाजा पर लगी पाबंदियों के मौहाल में जिंदगी जीने में होने वाली कठिनाइयों का विस्तृत खाका पेश किया गया है।
तानया हैरी का कहना था कि महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हैं साथ ही उन्होंने अपील किया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ये जिम्मेदारी बनती है कि गाजा में सभी लोगों को सभी सुविधाएँ आसानी से मिलें, सामान पर लगी पाबंदियां हटाई जाएं और मौजूदा समीकरणों को पलटकर शांति का रास्ता निकाला जाए।