भारत को यूएनएसी का स्थायी सदस्य बनाने के लिए अमेरिका ने भी अपना समर्थन दिया है। वहीं, इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की आम बहस में सवाल किया कि भारत, जापान, ब्राजील और उनके अपने राष्ट्र जैसे देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य क्यों नहीं हैं। उन्होंने आगे कहा कि वह दिन भी आएगा जब इसका समाधान किया जाएगा।
यूक्रेन के राष्ट्रपति ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार के बारे में बहुत सारी बातें हुईं, लेकिन आखिर में कोई नतीजा नहीं। उन्होंने कहा कि हमारा शांति सूत्र सार्वभौमिक है। ये दुनिया के उत्तर और दक्षिण के देशों को जोड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि यह उन लोगों के प्रतिनिधित्व का विस्तार करने के लिए कहता है जो अनसुने रह गए। उन्होंने कहा कि हम इस तरह की बातें कह रहे हैं, लेकिन रूस ने कभी इस तरह का बयान नहीं दिया।
भारत, इस्राइल, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका के साथ ब्रिटेन का गहरा संबंध- ट्रस
वहीं, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लिज ट्रस ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 77वें सत्र में भारत, इस्राइल, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका के साथ अपने संबंधों के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि इन लोकतांत्रिक देशों के साथ ब्रिटेन का गहरा संबंध है। उन्होंने आगे कहा कि इसलिए हम विभिन्न देशों के साथ साझेदारियां कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम भारत, इज़राइल, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे साथी लोकतंत्रों के साथ अपने संबंधों को गहरा कर रहे हैं। ब्रिटेन हिंद-प्रशांत और खाड़ी के देशों के साथ नए सुरक्षा संबंध बना रहा है।
बाइडन ने सुरक्षा परिषद में सुधार की बात दोहराई
इससे पहले, राष्ट्रपति बाइडन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र में अपने संबोधन में सुरक्षा परिषद में सुधार की बात दोहराई। बाइडन ने कहा कि उनका मानना है कि वक्त आ गया है, जब संस्था को और समावेशी बनाया जाए, ताकि यह आज के युग की जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा कर सके।
बाइडन ने वीटो पावर पर दिया बड़ा बयान
उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद के सदस्य, जिनमें अमेरिका भी शामिल है, उन्हें संयुक्त राष्ट्र चार्टर की रक्षा करनी चाहिए और वीटो से बचना चाहिए। बाइडन ने कहा कि वीटो सिर्फ विशेष अथवा विषम परिस्थितियों में ही होना चाहिए, ताकि परिषद की विश्वसनीयता और उसका प्रभाव बना रहे। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि अमेरिका सुरक्षा परिषद में स्थाई और अस्थायी, दोनों तरह के सदस्यों की संख्या बढ़ाने पर जोर देता है। इनमें वे देश भी शामिल हैं, जिनकी स्थाई सदस्यता की मांग का हम लंबे समय से समर्थन करते आ रहे हैं।