शांति वार्ता से पहले रूस-यूक्रेन युद्ध फिर तेज हो गया है। यूक्रेन के ड्रोन हमले में रूस के ब्लैक सी स्थित तामान पोर्ट पर आग लग गई और तेल टैंक सहित कई ढांचे क्षतिग्रस्त हुए। दो लोग घायल बताए गए हैं। जवाबी हमलों में ओडेसा क्षेत्र में बिजली-पानी व्यवस्था प्रभावित हुई। जिनेवा में प्रस्तावित वार्ता से पहले दोनों पक्ष सैन्य और कूटनीतिक दबाव बढ़ाते दिख रहे हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच शांति वार्ता की नई कोशिशों से ठीक पहले हमले तेज हो गए हैं। ब्लैक सी क्षेत्र में बड़े हमले की खबर सामने आई है, जहां यूक्रेन के ड्रोन हमले के बाद रूस के एक अहम बंदरगाह पर आग लग गई। यह हमला ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका की मध्यस्थता में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच नई वार्ता तय है। इससे साफ है कि जमीनी हालात अभी भी बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं।
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रिपोर्ट के मुताबिक यूक्रेन के ड्रोन हमले में रूस के क्रास्नोदार क्षेत्र के तामान ब्लैक सी पोर्ट पर आग लग गई। क्षेत्रीय गवर्नर ने बताया कि हमले में एक तेल भंडारण टैंक, वेयरहाउस और टर्मिनल को नुकसान पहुंचा है और दो लोग घायल हुए हैं। दूसरी तरफ रूस के ड्रोन के मलबे गिरने से यूक्रेन के ओडेसा क्षेत्र में नागरिक और परिवहन ढांचे को नुकसान पहुंचा। वहां बिजली और पानी की सप्लाई भी प्रभावित हुई है।
ऊर्जा ठिकाने बने निशाना
यूक्रेन लंबे दूरी वाले ड्रोन हमलों के जरिए रूस के ऊर्जा ठिकानों को निशाना बना रहा है। उसका मकसद रूस की तेल निर्यात से होने वाली कमाई को कम करना है ताकि युद्ध की क्षमता कमजोर पड़े। वहीं रूस लगातार यूक्रेन के पावर ग्रिड और नागरिक ढांचे पर हमले कर रहा है। यूक्रेन का आरोप है कि रूस सर्दियों को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है ताकि लोगों को गर्मी, रोशनी और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित किया जा सके।
शांति वार्ता से पहले बढ़ी कूटनीतिक हलचल
अमेरिका की पहल पर रूस और यूक्रेन के दूतों के बीच जिनेवा में नई वार्ता मंगलवार और बुधवार को प्रस्तावित है। जर्मनी में सुरक्षा सम्मेलन के दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने कहा कि शांति समझौते से पहले उनके देश को ठोस सुरक्षा गारंटी चाहिए।
उन्होंने डोनबास क्षेत्र को लेकर प्रस्तावित फ्री ट्रेड जोन मॉडल पर भी सवाल उठाए। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास ने कहा कि स्थायी शांति के लिए रूस को भी रियायत देनी होगी। इससे पहले अबू धाबी में हुई वार्ताओं के दौर भी डोनबास और प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर सहमति न बनने के कारण बेनतीजा रहे थे।