जिस समय यूक्रेन विवाद को लेकर अमेरिका और रूस के टकराव पर सारी दुनिया की निगाहें हैं, अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान ताइवान पर भी अपनी निगाहें टिकाए हुए हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के सूत्रों ने मीडिया ब्रीफिंग में इस बात की तरफ ध्यान खींचा है कि चीन ने ताइवान को खुद मिलाने का लक्ष्य घोषित कर रखा है। ऐसा करने में ताकत का इस्तेमाल करने की संभावना से उसने कभी इनकार नहीं किया है।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने पिछले हफ्ते कहा था कि यूक्रेन में जो होगा, उसकी गूंज ताइवान में भी सुनाई देगी। लेकिन अमेरिकी टीकाकारों ने कहा है कि फिलहाल चीन यूक्रेन में उभरी स्थिति पर सावधानी से नजर रखे हुए है। वह इस बात का आकलन करेगा कि यूक्रेन के मामले में पश्चिमी देश कैसी प्रतिक्रिया दिखाते हैं। फिलहाल, अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपियन यूनियन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने रूस के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है।
हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के फेयरबैंक सेंटर फॉर चाइनीज स्टडीज में रिसर्च फेलॉ लेव नैचमान ने टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘यूक्रेन के मामले में अमेरिका चाहे जैसी प्रतिक्रिया दिखाए, ताइवान के मामले में वह वैसी नहीं होगी। ताइवान के साथ अमेरिका ने दशकों से अलग ढंग से संबंध विकसित किया है। उसके मामले में अमेरिकी जिम्मेदारी यूक्रेन के प्रति दायित्व से अलग है।’
कुछ अन्य विशेषज्ञों ने भी इस संभावना का खंडन किया है कि यूक्रेन पर हमले के बाद चीन भी ताइवान को खुद में मिला लेने के लिए प्रोत्साहित होगा। यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में स्थित एसओएएस चाइना इंस्टीट्यूट के निदेशक स्टीव त्सांग ने कहा- ‘मुझे नहीं लगता कि चीन इस साल ताइवान के खिलाफ ताकत का इस्तेमाल करेगा। शी जिनपिंग असल में कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते।’ त्सांग ने कहा कि इस समय शी की नजर इस साल अक्तूबर में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के होने वाले महाधिवेशन पर है, जिसमें वे अपने लिए तीसरा कार्यकाल पाने की कोशिश करेंगे। अगर ताइवान अभियान नाकाम रहा, तो उनका ये मकसद पूरा नहीं होगा। इसलिए वे इस वर्ष ऐसा कोई जोखिम नहीं उठाएंगे।