फरवरी में यूक्रेन पर रूस के हमला करने के बाद से 63 लाख लोग यूक्रेन छोड़ चुके हैं। यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने इन शरणार्थियों का बांह पसार कर स्वागत किया। ईयू के सदस्य सभी 27 देशों ने बिना वीजा के इन शरणार्थियों को अपने यहां आने की इजाजत दी है। ईयू में सहमति बनी है कि इन लोगों को अगले तीन साल तक इन देशों में रहने और काम करने की अनुमति दी जाएगी। इन शरणार्थियों को तमाम तरह की सुविधाएं दी गई हैं, जिन पर ईयू देशों को अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है।
अब कई यूरोपीय विशेषज्ञ इस नई शरणार्थी समस्या के दूरगामी नतीजों की चर्चा करने लगे हैं। कुछ टीकाकारों ने कहा है कि लंबी अवधि में ये शरणार्थी ईयू और नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) के सदस्य देशों में सामाजिक अस्थिरता की वजह बन सकते हैँ। अगर ऐसा हुआ, तो इस पूरे क्षेत्र में उथल-पुथल की सूरत बनाने का रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का मकसद सधेगा।
संकेत है कि पोलैंड में अब यूक्रेनी शरणार्थियों के प्रति लोगों की हमदर्दी खत्म हो रही है। शुरुआत में पोलैंड ने भी इन शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे। इसकी वजह से पिछले तीन महीनों में पोलैंड की राजधानी वॉरसॉ की आबादी 15 फीसदी बढ़ गई है। शहर के मेयर राफाल ट्रजास्कोविस्की ने कहा है- आबादी में यह इजाफा हमारे ऊपर बड़ा बोझ साबित हो रहा है।
गैर-सरकारी संस्था सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के एक ताजा आकलन के मुताबिक यूक्रेनी शरणार्थियों की देखभाल पर सिर्फ पहले एक साल में ईयू देशों को 30 बिलियन डॉलर खर्च करने होंगे। इससे यूरोपीय अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौती खड़ी होगी, जहां पहले ही महंगाई आसमान छू रही है। इस संस्था से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक हाल के वर्षों में यह राय मजबूत हुई है कि शरणार्थियों के आगमन से मेजबान देश की राजनीतिक स्थिरता बुरी तरह प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से मेजबान देश में आवास, स्वास्थ्य व्यवस्था और अन्य संसाधानों पर भारी दबाव पैदा होता है। यह एक तरह से मेजबान आबादी की धीरज की परीक्षा बन जाता है।
कुछ विश्लेषणों में ध्यान दिलाया गया है कि यूरोपीय देशों में शरणार्थी संकट पैदा करना राष्ट्रपति पुतिन का एक पुराना मकसद रहा है। 2015-16 में पुतिन पश्चिम एशिया में ऐसी हालत बनाने में सहायक बने, जिससे 13 लाख लोग शरणार्थी बने। इनमें से ज्यादातर लोग सीरिया छोड़ कर निकले, जहां गृह युद्ध तेज हो गया था। सीरियाई शरणार्थियों को स्वीकार करने के मुद्दे पर ईयू में गहरा मतभेद खड़ा हो गया था। हंगरी, पोलैंड, स्लोवाकिया और चेक रिपब्लिक ने एक भी शरणार्थी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि पुतिन के निकट सहयोगी- बेलारुस के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लुकाशेंको खुलेआम यह कहते रहे हैं कि अगर इराक या अन्य देशों के शरणार्थी बेलारुस आए, तो वे वहां से उन्हें ईयू में प्रवेश कराने में मदद देंगे। इसको लेकर पिछले साल पोलैंड सीमा पर बड़ा संकट खड़ा हो गया था। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उरसुला वॉन डेर लियेन ने तब लुकाशेंको के इस रुख को ‘हाइब्रिड अटैक’ कहा था। अब सवाल उठाया जा रहा है कि क्या पुतिन ने जाने-अनजाने वैसा ही हमला ईयू पर किया है, जिसके नतीजे उसे लंबी अवधि में भुगतने होंगे?