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इराक से अमेरिकी सेना की वापसी पूरी: खत्म हुआ 12 साल का अभियान; ट्रंप ने क्या कहा, नई चुनौती क्या है?

Thu, 01 Oct 2026 02:00 AM IST
निर्मल कांत वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बगदाद।
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अमेरिकी सेना (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : फ्रीपिक
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अमेरिकी सेना ने बुधवार को इराक से अपने सभी सैनिकों की वापसी पूरी कर ली। इसके साथ ही आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के खिलाफ 12 साल से चल रहा अमेरिकी सैन्य अभियान खत्म हो गया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस अभियान के खत्म होने की सराहना की। हालांकि, उन्होंने इसे 'बहुत महंगा और नरक जैसा अभियान' बताया।
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अमेरिकी सेना के आखिरी सैनिक उत्तरी इराक के एक हवाई अड्डे से रवाना हुए। यह वापसी बगदाद और वाशिंगटन के बीच हुए समझौते के तहत हुई। ट्रंप ने 30 सितंबर की तय समय सीमा तक हुई वापसी को 'व्यवस्थित' बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि इस दलदल में अमेरिका को शामिल करने के फैसले बहुत खराब थे। उन्होंने कहा कि जल्द ही यह सब इतिहास का हिस्सा बन जाएगा।

उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना की वापसी अमेरिका और इराक की जीत है। उन्होंने इसे इस्लामिक स्टेट पर जीत का संकेत भी बताया। 

अमेरिकी सेना की वापसी पर दो साल पहले सहमति बनी थी। यह फैसला ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जारी है। इस युद्ध का असर कई बार इराक तक भी पहुंचा है। ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों ने अमेरिकी सैनिकों पर हमले किए हैं। इसके जवाब में अमेरिका ने इन गुटों के ठिकानों पर हमले किए हैं।
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ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब इस साल की शुरुआत में ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के उनके फैसले की तुलना इराक युद्ध से की जा रही है। ईरान के साथ युद्ध अब सातवें महीने के करीब पहुंच गया है। इसकी तुलना इराक युद्ध से इसलिए की जा रही है, क्योंकि इस अभियान का मकसद भी स्पष्ट नहीं बताया गया था।

हाल के वर्षों में वाशिंगटन ने पश्चिम एशिया से अपना फोकस एशिया की ओर करने की कोशिश की है। लेकिन यह बदलाव लगातार एक जैसा नहीं रहा। अमेरिकी रक्षा विभाग कभी पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी कम करता रहा। फिर वह नए संघर्षों में उलझता रहा। इनमें ईरान के साथ चल रहा युद्ध भी शामिल है।

इराक ने अमेरिकी अभियान के खत्म होने को देश की बढ़ती ताकत और संप्रभुता का संकेत बताया। ईरान समर्थित गुटों ने भी अमेरिकी सेना की वापसी का स्वागत किया है। लेकिन इराक के कुछ दूसरे लोगों ने इस पर चिंता जताई है। खास तौर पर कुर्द क्षेत्र में चिंता है। वहां कई लोगों को डर है कि इस्लामिक स्टेट फिर से मजबूत हो सकता है।

ईरान से जुड़े गुटों के हमले भी बढ़ सकते हैं। अमेरिकी सैनिकों के जाने से इन गुटों का हौसला बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। इस बीच इराकी सशस्त्र गुटों के भविष्य को लेकर भी सवाल बने हुए हैं। इराक सरकार इन गुटों को हथियार छोड़ने के लिए तैयार करने की कोशिश कर रही है। अब तक इसमें ज्यादा सफलता नहीं मिली है।

अमेरिकी रक्षा विभाग के प्रवक्ता शॉन पार्नेल ने एक बयान में कहा कि अमेरिकी सैनिकों और सैन्य सामान ने उत्तरी इराक के अर्ध-स्वायत्त कुर्द क्षेत्र में स्थित इरबिल के हवाई अड्डे से 'व्यवस्थित वापसी' पूरी कर ली है। उन्होंने कहा कि यह 12 साल के उस अभियान की सफलता को दिखाता है, जिसने इराक और पूरे क्षेत्र में आईएसआईएस को एक संगठित सैन्य खतरे के रूप में हरा दिया।

उन्होंने कहा कि अब युद्ध के समय चलने वाले गठबंधन अभियान से इराक के नेतृत्व वाले सुरक्षा अभियान की ओर बदलाव हो रहा है। इसे दोनों देशों के बीच सामान्य सुरक्षा संबंधों के जरिये समर्थन दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी सेना इराक के अपने साझेदारों को जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षण और खुफिया जानकारी देती रहेगी।

इराक के प्रधानमंत्री ने क्या कहा?
इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने अमेरिकी सेना की वापसी के मौके पर आयोजित समारोह की अध्यक्षता की। उन्होंने अमेरिकी सेना की वापसी को एक 'नए दौर' की शुरुआत बताया। उन्होंने कहा कि यह दौर इराक की संप्रभुता, मजबूत संस्थानों, तैयार सुरक्षा बलों, फैसले लेने में एकजुटता और मित्र देशों के साथ संतुलित साझेदारी पर आधारित होगा।

उन्होंने कहा कि इराकी सुरक्षा बल इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे। सरकार यह भी सुनिश्चित करेगी कि गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों के पास हथियार न रहें। अमेरिकी सैनिकों ने 2003 में इराक पर हमला किया था। इसका मकसद सद्दाम हुसैन की सरकार को हटाना था।

अमेरिकी सैनिक 2011 में इराक से चले गए थे। लेकिन तीन साल बाद इराकी अधिकारियों ने फिर एक छोटे अमेरिकी नेतृत्व वाले अभियान को बुलाया। इस अभियान का मकसद इस्लामिक स्टेट से लड़ना था। इस संगठन ने इराक के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था।

अब इस चरमपंथी संगठन के पास बिखरे हुए गुप्त ठिकानों वाले छोटे समूह ही बचे हैं। इसके बाद वाशिंगटन और बगदाद ने 2024 में इस अभियान को धीरे-धीरे खत्म करने पर सहमति बनाई। पिछले साल अमेरिकी सैनिक इराक के ज्यादातर इलाकों में मौजूद अपने ठिकानों से चले गए थे। लेकिन उत्तरी इराक के अर्ध-स्वायत्त कुर्द क्षेत्र में कुछ सौ सैनिक मौजूद रहे।

28 फरवरी को अमेरिका और इस्राइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। इसके बाद से कुर्द क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर लगातार हमले हुए हैं। ईरान समर्थित इराकी सशस्त्र गुटों ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ मिलकर सऊदी अरब पर भी हमले किए हैं।

इराकी सरकार ने शुरुआत में 30 सितंबर तक अमेरिकी सैनिकों की वापसी को सशस्त्र गुटों के हथियार छोड़ने की समय सीमा से जोड़ दिया था। कुछ छोटे सशस्त्र गुट हथियार सौंपने के लिए तैयार हो गए हैं। लेकिन ईरान के करीबी और ताकतवर गुटों ने हथियार छोड़ने से इनकार कर दिया।

कुछ गुटों ने हथियार छोड़ने के लिए ऐसी शर्तें रखीं, जिन्हें सरकार के लिए पूरा करना मुश्किल माना जा रहा है। इसके बाद अल-जैदी ने 30 सितंबर की समय सीमा में बदलाव किया। उन्होंने इस महीने की शुरुआत में न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि सशस्त्र गुटों के हथियार छोड़ने की समय सीमा जून 2027 तक बढ़ा दी गई है।

अमेरिकी सेना की वापसी का असर तुरंत दिखाई नहीं दे सकता। इसकी एक वजह यह है कि इराक में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी पहले ही काफी कम कर दी गई थी। लेकिन इराक के कुर्द क्षेत्र के अधिकारियों ने अमेरिकी सैनिकों के जाने को लेकर चिंता जताई है। खास तौर पर अमेरिकी हवाई रक्षा प्रणालियों को हटाए जाने को लेकर चिंता है।

कुर्द क्षेत्र की सरकार के सुरक्षा मंत्रालय ने कहा कि हाल में अमेरिका और ईरान के बीच हुए संघर्ष के दौरान कुर्द क्षेत्र पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों से 1,000 से ज्यादा हमले हुए। बयान में कहा गया कि इन जटिल क्षेत्रीय हालात के बीच अमेरिकी सेना का कुर्द क्षेत्र से चले जाना चिंता का विषय है। खासकर तब, जब उसकी जगह कोई रक्षा प्रणाली उपलब्ध नहीं कराई गई है।

दूसरी ओर, इराक में ईरान के साथ जुड़े गुटों ने अमेरिकी सेना की वापसी का जश्न मनाया है। ताकतवर कताइब हिजबुल्लाह सशस्त्र गुट के सुरक्षा अधिकारी अबू मुजाहिद अल-असफ ने एक बयान में कहा कि इराक की जमीन से कब्जे वाली विदेशी सेना को हार के बाद बाहर निकालना पूर्ण संप्रभुता की शुरुआत है। उन्होंने अल-जैदी और उनकी सरकार को चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि वे अमेरिकी योजनाओं को लागू न करें। 
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