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तिब्बती कार्यकर्ता ने दी जान: UN मुख्यालय के सामने किया आत्मदाह, चीन से आजादी की अपील कर लगाया मौत को गले

Sat, 04 Jul 2026 04:17 AM IST
अमन तिवारी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, न्यूयॉर्क

सार

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर एक व्यक्ति ने तिब्बत की आजादी की मांग करते हुए आत्मदाह कर लिया। घटना के बाद पुलिस जांच जारी है, जबकि तिब्बती संगठनों ने इसे चीन की नीतियों के विरोध से जोड़ा है।
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यूएन मुख्यालय के बाहर आत्मदाह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमेरिकी शहर न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के सामने तिब्बती झंडा लिए एक व्यक्ति ने खुद को आग लगाकर मौत को गले लगाया। अधिकारियों ने इस 52 वर्षीय व्यक्ति की मौत की पुष्टि की है। तिब्बती कार्यकर्ता और तिब्बत से बाहर रह रहे तिब्बतियों के एक मीडिया आउटलेट ने उसकी पहचान एक तिब्बती के तौर पर की है, जिसने आजादी की अपील करते हुए खुद को आग लगा ली।
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पुलिस ने अभी व्यक्ति का नाम नहीं बताया, क्योंकि परिजनों को इसकी सूचना नहीं दी गई है, लेकिन तिब्बत से बाहर रह रहे तिब्बतियों के मीडिया आउटलेट (वॉयस ऑफ तिब्बत) ने कहा कि तिब्बती कार्यकर्ता लोग्बा रंगजेन ने न्यूयॉर्क में यूएन मुख्यालय हेडक्वार्टर के बाहर तिब्बत की आजादी और एकता के लिए लाइव अपील करने के बाद खुद को आग लगाई। पुलिस ने कहा, सूचना मिलने पर जब पुलिस मौके पर पहुंची तो बुरी तरह जले व्यक्ति को अस्पताल ले जाया गया जहां बाद में उसे मृत घोषित कर दिया गया। 

चीन की पाबंदियों से नाराज था रंगजेन
स्थानीय न्यूज साइट एएमन्यूयॉर्क की रिपोर्ट के मुताबिक, वह एक उबर चालक था और तिब्बती ध्वज लेकर घटनास्थल पर पहुंचा था। वेबसाइट ने उबर ड्राइवर लोबसांग पालजोर के हवाले से कहा कि वह रंगजेन को तिब्बती समुदाय की बैठकों में जानता था। पालजोर ने न्यूज वेबसाइट को बताया कि रंगजेन चीनी सरकार द्वारा अपने देशवासियों पर लगाई गई पाबंदियों से बहुत नाराज था।
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हाल ही में लागू चीनी जातीय एकता कानून का विरोध
अमेरिका और यूरोपीय संघ ने चीन के नए एथनिक यूनिटी कानून (जातीय एकता कानून) पर चिंता जताई है। यह कानून इस सप्ताह लागू हुआ है और बीजिंग को अपनी सीमाओं के बाहर के लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का कानूनी आधार देता है। यह कानून देश के 55 जातीय अल्पसंख्यक समूहों (जिनमें तिब्बती और उइगर शामिल हैं) के बीच एक साझा राष्ट्रीय पहचान बनाता है। इनमें से कुछ समूह चीनी शासन से नाखुश हैं। दुनिया भर के तिब्बतियों ने इसका विरोध किया है।

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तिब्बतियों की पहचान नष्ट कर रहा चीन: चीन का कहना है कि तिब्बत 13वीं सदी के मध्य से उसके क्षेत्र का हिस्सा रहा है और 1951 से उसकी कम्युनिस्ट पार्टी यहां शासन कर रही है। तिब्बतियों का कहना है कि वे पहले से आजाद रहे हैं और चीन यहां के संसाधनों का फायदा उठा रही है। वह तिब्बती सांस्कृतिक पहचान भी खत्म करना चाहती है।
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शी ने तिब्बत पर नियंत्रण बढ़ाया
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूह और निर्वासित लोग तिब्बती इलाकों में चीन के दमनकारी शासन की अक्सर निंदा करते रहे हैं। चीन ऐसी बातों को नकारता है। चीन में जातीय अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दे बहुत संवेदनशील हैं। तिब्बतियों और अन्य अल्पसंख्यकों पर कथित अलगाववाद के किसी भी संकेत के लिए कड़ी नजर रखी जाती है। 2012 में शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद से बीजिंग ने तिब्बत पर अपना संस्थागत नियंत्रण और बढ़ा दिया है।
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