अंग्रेजी समाचार वेबसाइट हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार पांच विदेशी मीडिया संस्थानों के पत्रकारों ने चीनी सरकार द्वारा शिनजियांग के तीन शहरों में आयोजित एक यात्रा कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस यात्रा कार्यक्रम से प्रतीत होता है कि अमेरिका-चीन संबंधों की वजह से अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी छवि को लेकर बीजिंग और चिंतित हुआ है। चीन की हरकतों को देखते हुए मुस्लिम देश अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) से जुड़ रहे हैं। बता दें कि तुर्की के विदेश मंत्री ने फरवरी में इन शिविरों को 'मानवता के लिए बड़ी शर्मिंदगी' कहा था।
तीन दशक पहले तियानांमेन स्क्वायर में विरोध प्रदर्शनों को शांत करने के लिए सैनिक भेजे गए थे। तब से स्थानीय आबादी को शांत रखने के लिए शी जिनपिंग की नीतियों ने चीन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौती सी दे दी है। पहले इन शिविरों के अस्तित्व को ही अस्वीकार करने वाला चीन अब इनकी संख्या बढ़ा रहा है और आतंकवाद के खिलाफ एक महत्त्वपूर्ण हथियार कहकर इनका बचाव भी कर रहा है। ह्यूमन राइट्स वॉच की वरिष्ठ शोधकर्ता माया वांद कहती हैं, 'आप देख सकते हैं कि चीनी सरकार ने समय के साथ अपनी स्थिति में बदलाव किया है, वह इनकार से हटकर अब पूरी तरह से आक्रामक हो गई है।'
यात्रा के दौरान चीनी अधिकारियों ने कहा कि विदेशी मीडिया ने सरकार के शिनजियांग में किए जा रहे प्रयासों की गलत छवि पेश की है। यात्रा के दौरान अधिकतर समय आर्थिक विकास और नई शैक्षिक पहलों पर ही केंद्रित रहा। सरकार का संदेश आसान था- शी की नीतियां इस क्षेत्र को शांत करने और अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में मदद कर रही थीं।
यह कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शी जिनपिंग के बढ़ते विश्वास को भी परिलक्षित कर रहा था, जहां उन्होंने सरकार के एक केंद्रीय मॉडल, जो सजा देने के लिए, सम्मानित कने के लिए और नागरिकों के आचरण को नियंत्रित करने के लिए एडवांस तकनीक का प्रयोग करती है, पश्चिमी पद्धति की लोकतांत्रिक व्यवस्था को सीधे चुनौती दी है।
यात्रा में शामिल रहे पीटर मार्टिन कहते हैं कि यात्रा के दौरान वह किसी नागरिक से स्वतंत्रतापूर्वक बात नहीं कर सके और न ही उन्हें कहीं अकेले जाने दिया गया। हालांकि, समूह को अधिकारियों से सवाल पूछने की इजाजत थी। विदेशी पत्रकारों का कहना है कि तीन में रिपोर्टिंग करना और मुश्किल होता जा रहा है।