1948 के चुनाव में नेशनल पार्टी केवल 38 फीसद वोट पाकर सत्ता में आ गई। उसके बाद इसने देशभर में रंगभेद की नीति लागू कर दी। काले लोगों को शहरों से दूर अलग बस्तियों में बसने को मजबूर कर दिया गया। गोरे कारोबारी, अपने यहां 6 से ज्यादा अश्वेतों को नौकरी पर नहीं रख सकते थे। अश्वेतों को देश की नागरिकता और उनकी अपनी जमीन पर अधिकार तक से वंचित कर दिया गया।
कई बरस तक दुनिया ने दक्षिण अफ्ऱीका के घोर रंगभेद की तरफ से आंखें मूंद रखी थीं। 1960 में वहां अश्वेतों के शार्पविल नरसंहार कांड के बाद आखिरकार कनाडा और भारत के दबाव में दक्षिण अफ्ऱीका को ब्रिटिश कॉमनवेल्थ से बाहर किया गया। वो ब्रिटेन की महारानी के निजाम के दायरे से भी बाहर हो गया।
ब्रिटेन से आजाद होने के बाद दक्षिण अफ्रीका की तरक्की को और रफ़्तार मिल गई। इसने रैंड के नाम से अपनी नई करेंसी शुरू कर दी, जो अमेरिकी डॉलर के बराबर क़ीमत की थी। दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों के खिलाफ रंगभेद के ज़ुल्म जारी रहे। कई बरस के आंदोलन के बाद जाकर दुनिया की निगाहें इस जुल्म की तरफ गईं।
1980 के दशक में हिंसक संघर्ष, सामाजिक उठा-पटक और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते दक्षिण अफ्ऱीका की सरकार को रंगभेद की नीति पर पुनर्विचार को मजबूर कर दिया। 1985 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति लुई बोथा ने एलान किया कि अब बदलाव का वक़्त आ गया है। उनका देश अब रंगभेद के ख़ात्मे के लिए तैयार है।
लोगों को लगा कि दक्षिण अफ्ऱीका के अश्वेतों को आख़िर बराबरी का हक़ मिलने वाला है। पर आखिरी मौके पर बोथा का इरादा बदल गया। रंगभेद की नीति जारी रही। लेकिन इस बार दुनिया ने दक्षिण अफ्रीका को सबक सिखाने की ठानी। कई देशों ने दक्षिण अफ्ऱीका पर सख्त आर्थिक पाबंदियां लगा दीं। बहुत सी कंपनियां वहां से भाग खड़ी हुईं।
तरक्की की चकाचौंध से जगमग जोहानिसबर्ग शहर वीरान होने लगा। शहर के हिलब्रो जैसे कारोबारी इलाक़े सुनसान हो गए। जो थोड़े-बहुत कारोबार बचे भी थे, वो आपराधिक गिरोहों को शिकार बनने लगे। खाली इमारतों में ऐसे लोगों ने डेरा जमा लिए। जिन इमारतों में कारोबार की चकाचौंध थी, वहां वेश्यालय और ड्रग के काले धंधे का अंधेरा छा गया था। शहर को बदनामी का ग्रहण लग गया था।
आखिरकार 1990 के दशक में राष्ट्रपति एफ। डब्ल्यू डे क्लर्क की अगुवाई में दक्षिण अफ्ऱीका ने अपने अश्वेत नागरिकों से सुलह-समझौते की बातचीत शुरू की। रंगभेद को ख़त्म करने की दिशा में क़दम उठाए जाने लगे। अश्वेतों के दिग्गज नेता नेल्सन मंडेला को रॉबेन आइलैंड की जेल से रिहा किया गया।
1994 में दक्षिण अफ्ऱीका में पहले लोकतांत्रिक चुनाव हुए, जिसमें अश्वेत लोगों ने भी हिस्सा लिया। लेकिन, इसके साथ ही दक्षिण अफ्ऱीका में एक बार फिर अनिश्चितता का दौर शुरू हो गया। रंगभेद की दीवारें गिरीं तो जोहानिसबर्ग शहर में आबादी की बाढ़ सी आ गई। जोहानिसबर्ग के बीचों-बीच का जो कारोबारी इलाका कभी धन-दौलत की चमक से रौशन था, वो धरने-प्रदर्शनों का ठिकाना बन गया। विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक भिड़ंत होने लगी।
रंगभेद की दीवारों के भीतर बंद दक्षिण अफ्रीका की सामाजिक समस्याओं के नासूर फूट-फूटकर बहने लगे। घबराए कारोबारियों में फिर से भगदड़ मच गई। कई बैंक तो अपना साज-ओ-सामान तक समेट नहीं पाए। उनकी वीरान इमारतों में बिखरे सामान उस दौर की दास्तान बयां करते हैं। तहखानों के साथ यहां आप को फ्लॉपी डिस्क, दस्तावेज और फाइलें बिखरी हुई दिखेंगी। एबीएसए बैंक के खाली गुम्बद के तले आप को कतार में लगी नीली फाइलें मिलेंगी। इनमें एबीएसए बैंक के ग्राहकों का हर लेन-देन और ख़तो-किताबत का हिसाब सहेजकर रखा हुआ है।
लौट रही हैं रौनकें
जोहानिसबर्ग शहर के पुराने हिस्से में 17 डायगोनल स्ट्रीट पर एक विशाल इमारत है। ये बिल्डिंग कभी जोहानिसबर्ग स्टॉक एक्सचेंज थी। पर आज खाली पड़ी इस इमारत को ये सोचकर तामीर किया गया था कि यहां 75 साल तक शेयर बाजार चलेगा। लेकिन 20 साल के भीतर ही पूरा इलाक़ा वीरान हो गया। शेयर बाजार भी सैंडटन नाम के नए कारोबारी इलाके में चला गया।
अब स्टॉक एक्सचेंज की ये इमारत वीरान है। कभी-कभार कुछ पार्टियां होती हैं। महफिलें सजती हैं। यहां लगे फोन शांत पड़े हैं। शेयरों की कीमतें दिखाने वाले बोर्ड खाली। ऐसी ही एक बिल्डिंग है समरसेट हाउस। कई बरस तक यहां बेघर लोगों ने ठिकाना बनाया हुआ था। एक दौर की ये मशहूर इमारत अब फिर से लोगों के रहने लायक बनायी जा रही है।
पिछले एक दशक से जोहानिसबर्ग में रौनकें फिर से लौट रही हैं। अश्वेत मध्यम वर्ग की तरक़्क़ी की वजह से किराए बढ़ रहे हैं। मांग बढ़ रही है। अब लोग दूर स्थित कस्बों से लंबा सफर करके जोहानिसबर्ग आने के बजाय यहीं रहने को तरजीह दे रहे हैं। नतीजा ये कि नई दुकानें खुल रही हैं। नए कारोबार शुरू हो रहे हैं। सैलानियों की आवक में तेजी आई है। होटल, हॉस्टल, महफिलों के अड्डे रौशन हो रहे हैं। माबोनेंग जैसी स्लम बस्तियों का रंग-रूप भी दल रहा है।
स्टॉक एक्सचेंज की पुरानी इमारत में कभी-कभी कला प्रदर्शनियां लगने लगी हैं। आपराधिक घटनाओं के बावजूद 2018 में जोहानिसबर्ग अफ्ऱीका का सबसे ज़्यादा सैलानी आकर्षित करने वाला शहर था। इसने ये मुकाम केपटाउन और मोरक्को के मराकेश शहर को पछाड़कर हासिल किया। शहर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम बेहतर हो रहा है। ऐप से चलने वाली टैक्सियां भी आसानी से मिल जाती हैं। जोहानिसबर्ग एक बार फिर से सिटी ऑफ गोल्ड कहलाने की उम्मीद से जगमग है।