यहां कैपिटल हिल (अमेरिकी संसद भवन) में जिस आसानी से डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक घुसने और तोड़फोड़ करने में सफल हो गए, उसके बाद देश में पुलिस की भूमिका पर बहस शुरू हो गई है। ये सवाल भी उठाया गया है कि अगर ये प्रदर्शनकारी ब्लैक समुदाय के होते या ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के दौरान ऐसी घटना हुई होती तो पुलिस और सत्ता प्रतिष्ठान की क्या प्रतिक्रिया होती? अमेरिकी कांग्रेस के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के लिए नव-निर्वाचित डेमोक्रेटिक सदस्य कोरी बुश ने इस घटना के तुरंत बाद कहा कि अगर ब्लैक समुदाय के लोगों ने कैपिटल हिल में घुसने की कोशिश की होती, तो उन्हें गोलियों से भून दिया गया होता।
ट्रंप समर्थकों ने बुधवार की रैली के दौरान के खुलेआम कॉन्फेडरेट झंडों को लहराया। ये झंडे उस दौर के अमेरिका के प्रतीक हैं, जब देश में गुलामी प्रथा को कानूनी मान्यता हासिल थी। कई ट्रंप समर्थक ऐसे झंडे लेकर कैपिटल हिल में घुस गए। कुछ टीकाकारों ने ध्यान दिलाया कि 1860 में निर्वाचित हुए राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने जब गुलामी प्रथा खत्म की, उसके बाद यह पहला मौका है, जब ये झंडे संसद भवन में देखे गए।
ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन की शुरुआत 2014 में माइकल ब्राउन नाम के एक 18 वर्षीय ब्लैक युवक की पुलिस की गोली से मौत के बाद हुई थी। ये घटना फर्गूसन शहर में हुई थी। बुधवार की घटना के बाद ब्राउन की मां लेजले मैकस्पैडन ने वॉशिंगटन में पुलिस के व्यवहार पर हैरत जताई। अखबार वॉशिंगटन पोस्ट से बातचीत में उन्होंने कहा- हमलावरों पर न तो गोली चलाई गई, ना रबर के बुलेट चलाए गए। ऐसा कुछ नहीं हुआ, जो हम (ब्लैक समुदाय के लोग) देखते रहे हैं।
पिछले साल मिनियापोलिस शहर में जॉर्ज फ्लॉयड नाम के एक ब्लैक व्यक्ति की पुलिस के हाथों मौत के बाद फिर से ब्लैक लाइव्स मैटर ने जोर पकड़ा था। ऑरेगन राज्य के पोर्टलैंड शहर में उस आंदोलन में शामिल हुए 27 वर्षीय ग्रेगरी मैकेलवी ने एक अखबार से कहा कि वहां दर्जनों लोगों को पुलिस ने पीटा और उन पर आंसू गैस छोड़ी। मैकेलवी ने कहा- “हमने वहां किसी संघीय इमारत में घुसने की कोशिश नहीं की थी। लेकिन हमारा सामना ऐसे लोगों से हुआ जो देखने में सैनिक लग रहे थे। वे युद्ध की ड्रेस पहने हुए थे। उनके साथ बख्तरबंद गाड़ियां थीं। और आज यह दिखा कि पुलिसकर्मी बाइक पर चल रहे हैं।”
सेना के रिटायर्ड कर्नल 62 वर्षीय डैनी टी स्टोन ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा- जब मैं सुबह सो कर उठा तो सिस्टम में मेरा भरोसा था। फिर मैंने टीवी स्क्रीन पर देखा कि श्वेत भीड़ कैपिटल हिल पर धावा बोल रही है। यह श्वेत समुदाय के मन में बैठी उसी शिकायत का नतीजा था, जिसकी वजह से 2016 में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव जीते और चार साल बाद वे अमेरिकी इतिहास में सबसे ज्यादा वोट पाने वाले दूसरे व्यक्ति बने।
ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के नेता डीरॉय मैकेनसन कहा कि ब्लैक और ब्राउन लोगों को इससे बहुत कम गलतियों के लिए गोली मारी जाती रही है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि 2013 में 34 वर्षीय ब्लैक डेंटल हाइजिनिस्ट मिरियम केरी ने गलती से व्हाइट हाउस के पास अपने वाहन से बैरियर को तोड़ने के बाद भागने की कोशिश की थी, तो पीछा करके उन्हें गोली मार दी गई थी। लेकिन ट्रंप समर्थक कैपिटल हिल के भीतर घुस गए और हाउस के स्पीकर की डेस्क पर चढ़कर बैठक गए। उन्होंने कहा कि ब्लैक लोगों को बिल्डिंग के अंदर घुसने भी नहीं दिया जाता। ऐसी कोशिश करने पर उन पर गोलियों की बौछार कर दी जाती। सिविल राइट्स अटार्नी बेन क्रम्प ने भी कहा है कि ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलनकारियों और ट्रंप समर्थक भीड़ के साथ पुलिस के व्यवहार में जो अंतर रहा, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
ब्लैक लाइव्स मैटर की डिस्ट्रिक्ट कोलंबिया शाखा ने एक बयान में वॉशिंगटन के अधिकारियों और बड़े कारोबारियों से अपील की है कि वे ट्रंप समर्थकों की निंदा करें, जिन्होंने हिंसा की धमकी पहले से दे रखी थी। बयान में होटल मालिकों से कहा गया है कि ऐसे प्रदर्शनों के दिन वे अपने होटलों को बंद रखें ताकि हिंसक लोग आकर वहां ठहर नहीं सकें। बयान में कहा गया- हालांकि हमें (इस घटना से) कोई हैरत नहीं हुई है, लेकिन स्थिति को इस हद तक नहीं आने दिया जाना चाहिए था। ब्लैक लाइव्स मैटर कार्यकर्ताओं से क्रूर व्यवहार करने की जगह यहां के अधिकारियों को महीनों पहले हस्तक्षेप करना चाहिए था। लेकिन श्वेत उग्रवादियों का मनोबल बढ़ने दिया गया और उनमें यह भरोसा बनने दिया गया कि वे हमारे शहर में आकर आतंक का राज कायम कर सकते हैं।