लंबे ऊहापोह के बाद नेपाली कांग्रेस ने देश में जारी राजनीतिक संकट के बारे में अपना रुख साफ किया है। लेकिन इससे देश के सियासी संकट का कोई तुरंत समाधान निकलता नहीं दिखता। मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस ने अब फैसला कर लिया है कि वह प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को उनके पद से हटाने की कोशिश में शामिल होगी। साथ ही वह अपने नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाने की कोशिश करेगी। पुष्प कमल दहल के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी सेंटर) और जनता समाजवादी पार्टी ने नेपाली कांग्रेस के इस रुख का स्वागत किया है। इसे इस बात का संकेत माना गया है कि ये दोनों पार्टियां नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा को सरकार बनाने के लिए अपना समर्थन दे सकती हैं।
इसके बावजूद क्या नई सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है, ऐसा यहां कोई नहीं मानता। नेपाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष बिमलेंद्र निधि ने कहा है कि माओवादी सेंटर और जनता समाजवादी पार्टी अगर समर्थन देते हैं, तो इसमें कोई शक नहीं है कि नेपाली कांग्रेस ओली को हटाने की पहल करेगी। उस हाल में पार्टी अविश्वास प्रस्ताव पेश करेगी। निधि ने ध्यान दिलाया कि पहले जनता समाजवादी पार्टी के मन ना बना पाने के कारण ओली को हटाना संभव नहीं हुआ था। इस पार्टी के संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में 32 सदस्य हैं।
ओली के समर्थन देने या ना देने के सवाल पर जनता समाजवादी पार्टी में मतभेद रहे हैं। पार्टी अध्यक्ष महंथ ठाकुर के नेतृत्व वाले खेमे को ओली के करीब माना जाता है। उसकी ओली के साथ बातचीत भी चलती रही है। उधर उपेंद्र यादव और बाबूराम भट्टराई के नेतृत्व वाला खेमा ओली से हाथ मिलाने का विरोधी है।
जानकारों का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट का 23 फरवरी का फैसला नहीं आया होता, तो नेपाली कांग्रेस के रुख तय करने के बाद देश की सियासी सूरत साफ हो जाती। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक सत्ताधारी पार्टी के माधव नेपाल खेमे की ओली के नेतृत्व वाले गुट के साथ बने रहने की अनिवार्यता बन गई। इससे पुष्प कमल दहल के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी के सदस्यों की संख्या कम रह गई। अब नेपाली कांग्रेस, दहल खेमा और जनता समाजवादी पार्टी तीनों मिल कर बहुमत की सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं।
गौरतलब है कि अभी तक दहल के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी ने ओली के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया है। सुप्रीम कोर्ट के 23 फरवरी के फैसले के तहत की गई व्याख्या के मुताबिक माओवादी सेंटर पार्टी ने ये समर्थन 2018 में ओली सरकार को दिया था। कोर्ट ने व्याख्या इसलिए की क्योंकि उसने दहल, माधव नेपाल और ओली खेमों के विलय से नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनाए जाने को अवैध ठहरा दिया था। इस व्याख्या के मुताबिक ओली के नेतृत्व वाली सरकार सीपीएन-यूएमएल पार्टी की सरकार है।
जनता समाजवादी पार्टी ने कहा है कि उसने नेपाली कांग्रेस के सामने कुछ शर्तें रखी हैं। अगर वह उन्हें मान लेती है, तो वह उसे अपना समर्थन देगी। पार्टी ने कहा है कि इस बीच अगर माओवादी सेंटर ने समर्थन वापस ले लिया, तो उसके सामने नेपाली कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन देने की मजबूरी भी बन सकती है।
इस पेच दर पेच को देखते हुए ज्यादातर विशेषज्ञ यही मान रहे हैं कि अगले जून-जुलाई तक संसदीय चुनाव कराने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। नेपाली कांग्रेस के नेता रमेश पोखरियाल ने कहा भी है कि पार्टी को इसी सदन में सरकार का नेतृत्व करने के बजाय अगले चुनाव की तैयारी करनी चाहिए। गौरतलब है कि निर्वाचन आयोग ने अप्रैल में चुनाव कराने की लगभग पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन सदन भंग कराने के ओली सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया। उसके बाद नए हालात पैदा हो गए। ये हालात इतने उलझे हुए हैं कि नए चुनाव के बिना कोई समाधान निकलता नहीं दिखता।