यूक्रेन के मुद्दे पर अमेरिका और रूस के बीच बढ़े तनाव के बीच यूरोप में सबसे ज्यादा कठिन स्थिति जर्मनी के लिए पैदा हुई है। उसके लिए किसी एक का खुल कर पक्ष लेना मुश्किल बना हुआ है। जर्मनी में आम तौर पर ये आशंका जताई गई है कि अगर ये टकराव बढ़ा, तो जर्मनी को उन फायदों से हाथ धोना पड़ सकता है, जो शीत युद्ध खत्म होने के बाद उसे हासिल हुए थे।
शीत युद्ध के बाद जर्मनी की अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हुई। रूस, सोवियत खेमे से निकले पूर्वी यूरोप के देश, और चीन के रूप में जर्मनी को नया बाजार मिला। जर्मनी की बनी महंगी कारें इन देशों में खूब बिकीं। पूर्वी यूरोप के दूसरे देश भी जर्मनी का बाजार बन कर सामने आए। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इसीलिए जर्मनी नहीं चाहता कि अब रूस के साथ अमेरिका या उसके नेतृत्व वाले सैनिक गठबंधन नाटो का युद्ध हो। उससे न सिर्फ पूर्वी यूरोप का बाजार उसके हाथ से निकल सकता है, बल्कि चीन के साथ भी रिश्ते खराब हो सकते हैँ। चीन इस विवाद में खुल कर रूस का साथ दे रहा है।
पिछले दिनों जब अमेरिका ने यूक्रेन को सैन्य मदद देने की अपील की, तो जर्मनी अकेला बड़ा यूरोपीय देश बना, जिसने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उधर जर्मनी ने अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के रुख से अलग चीन से भी अपेक्षाकृत बेहतर संबंध बनाए रखे हैं। जर्मनी की फौरी चिंता रूस से आने वाली गैस है। यूरोप अभी गैस की महंगाई झेल रहा है। ऐसे में अंदेशा है कि अगर युद्ध हुआ, तो रूस गैस की सप्लाई रोक सकता है। उससे यूरोप में हालत और बिगड़ जाएगी। इसके अलावा रूस से जर्मनी तक बनी नॉर्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइपलाइन का चालू होना और मुश्किल हो जाएगा। जबकि जर्मनी अपने लिए इस पाइपलाइन को बेहद अहम मानता है।
लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि अगर जर्मनी यूक्रेन विवाद पर अपने मौजूदा असमंजस से नहीं निकलता है, तो उसके लिए यूरोप में अपनी अग्रणी भूमिका बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा। यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने नाते अकसर यूरोपियन यूनियन के भीतर जर्मनी फैसलों को अपने माफिक प्रभावित करता रहा है।