दरअसल ईरान और अमेरिका के बीच तनाव की असली वजह कच्चा तेल पैदा करने वाले अरब देशों पर प्रभुत्व है। ईरान का कहना है कि यह संघर्ष दो विचारधाराओं का है— एक ओर सूफी उदारवादी हैं तो दूसरी ओर कट्टर वहाबी जो अलकायदा और तालिबान से लेकर आईएसआईएस तक को मदद करते हैं।
सुन्नी बनाम शिया देश
इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में अल्पसंख्यक होने के बावजूद शिया सरकार बनाने में कामयाब हो गए हैं। इन सभी में ईरान का हाथ है। यही अरब संघर्ष की मुख्य वजह है। सउदी अरब, कतर, मिस्र, तुर्की, ओमान, जॉर्डन और कुवैत जैसे सुन्नी देश ईरान का दबदबा रोकना चाहते हैं। इजरायल और अमेरिका उनकी मदद कर रहे हैं। वह चाहे सीरिया में बशर अल असद की सरकार के खिलाफ युद्ध कर रहे सुन्नी विद्रोही हों या यमन में हूती विद्रोही।
आईएस के साथ युद्ध
ईरानी नेताओं का दावा है कि कई सालों से एक ओर जहां जनरल सुलेमानी के नेतृत्व में ईरानी सेना इराक और सीरिया की धरती पर अलकायदा और आईएसआईएस के साथ युद्ध लड़ रही थी, वहीं दूसरी ओर उसने यमन में सक्रिय हूती विद्रोहियों और लेबनान के हिजबुल्लाह विद्रोहियों को हथियार और आर्थिक सहायता भी दी।
इलाके में बढ़ता प्रभाव
मध्य पूर्व के पूरे इलाके में प्रभुत्व बढ़ाने की रणनीतिक जंग में ईरान सउदी अरब आदि से आगे बढ़ रहा है। अपने समर्थक शाह को ईरान से निर्वासित करने से नाराज अमेरिका ने 1980 से आठ साल तक चले युद्ध में इराक का साथ दिया था। लेकिन ईरान खुद को बचाने और खोई जमीन हासिल करने में भी सफल रहा। सद्दाम हुसैन के पतन के बाद से ईरान और इराक मित्र बन गए हैं।
अमेरिकी हवाई हमले में ईरान के शीर्ष कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत से भारत बेहद चिंतित है। भारत ने अमेरिकी कार्रवाई से पूरी दुनिया के चौंकने का जिक्र करते हुए दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। भारत को लगता है कि दोनों देशों के बीच तनाव के और बढने से क्षेत्रीय शांति पर प्रतिकूल असर के कारण तेल आयात की राह में नया संकट खड़ा हो जाएगा। अमेरिकी प्रतिबंध के कारण भारत को पहले से ईरान से कच्चे तेल के आयात पर पाबंदी लगानी पड़ी है।
अमेरिकी कार्रवाई पर भारत ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि हमने गौर किया है कि अमेरिका ने ईरान के एक वरिष्ठ नेता को मार दिया है। इस कारण तनाव में वृद्धि ने दुनिया को चौंका दिया है। इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमने लगातार सभी पक्षों से संयम बरतने की वकालत की है।
क्यों चिंतित है भारत
अगर ईरान अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा तो खाड़ी देशों से तेल आयात के रास्ते में रुकावट आएगी। इस कारण देश के पेट्रोलियम उत्पाद की कीमतों में बढ़ोत्तरी होगी। अमेरिकी दबाव में तेल आयात बंद करने से ईरान पहले से ही भारत से नाराज है। अब इस हमले के बाद जब दोनों देशों के संबंधों में और कटुता आएगी तब भारत के लिए अपनी भूमिका तय करना बेहद मुश्किल होगा। भारत की चिंता ईरान में अपने चाबहार परियोजना को ले कर भी है जो कि सामरिक दृष्टि से बेहद अहम है।
अमेरिकी विरोध में जुगलबंदी
अमेरिकी कार्रवाई के बाद दुनिया के कई देश ईरान के पक्ष में खड़े हो गए हैं। चीन, रूस, सीरिया सहित कई देशों ने अमेरिकी हमले की निंदा की है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तनाव बढ़ा तो कई खाड़ी देश ईरान के पक्ष में खड़े होंगे।
भारत में भी बम धमाके की कोशिश का था संदिग्ध
जनरल सुलेमानी पर फरवरी, 2012 में दिल्ली में इस्राइली राजनयिकों को बम धमाके से मारने की कोशिश का भी आरोप था। हालांकि इस हमले में कोई घायल नहीं हुआ था। दिल्ली पुलिस की जांच में इस धमाके के पीछे कुद्स सेना का हाथ पाया गया था। भारत के अलावा जर्मनी, बोस्निया, बुल्गारिया, केन्या, बहरीन और तुर्की में भी कुद्स सेना की साजिशों का खुलासा हुआ था।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि जनरल कासिम सुलेमानी का कई साल पहले ही सफाया कर दिया जाना चाहिए था। क्योंकि ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के शक्तिशाली कमांडर ने हजारों अमेरिकियों की हत्या की है और कई अन्य लोगों को मारने की भी साजिश रच रहा था।
ट्रंप ने ट्वीट कर कहा, सुलेमानी ने हजारों अमेरिकियों की हत्या की या बुरी तरह घायल कर दिया। वह कई और लोगों को मारने की कोशिश में था। आखिरकार वह मारा गया। वह लाखों लोगों की मौत के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार था। सुलेमानी से लोग देश के भीतर और बाहर भी नफरत करते थे।
उन्होंने कहा, वहां के नागरिक उससे डरते थे लेकिन ईरान इस सच्चाई को कभी भी स्वीकार नहीं करेगा। वहां के लोग खुश हैं लेकिन वहां के नेता बाहरी दुनिया को यह पता नहीं चलने देंगे। ट्रंप ने एक अन्य ट्वीट में कहा, ‘ईरान कभी भी जंग नहीं जीत सकता लेकिन बातचीत की गुंजाइश कभी हारती नहीं।’
मध्य-पूर्व में 3000 और सैनिक तैनात करेगा अमेरिका
ईरानी सैन्य कमांडर की हत्या के बाद मध्य-पूर्व में की ताजा स्थिति को देखते हुए अमेरिका ने सैनिकों की तैनाती बढ़ाने जा रहा है। अमेरिकी सैन्य मुख्यालय पेंटागन के सूत्रों ने बताया कि तीन हजार और सैनिकों को वहां तैनात किया जाएगा। बीते साल मई से अब तक अमेरिका मध्य-पूर्व में 14 हजार अतिरिक्त सैनिक तैनात कर चुका है।