यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज (एफसास) ने दावा किया कि लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन डिजिटल प्लेटफार्म के जरिए जिहाद का प्रचार कर रहे हैं। 2008 में हुए मुंबई हमले के लिए जिहादी भी इस तरह जुटाए गए थे। एफसास के मुताबिक लश्कर-ए-तैयबा के साथ इस्लामिक स्टेट और तालिबान जैसे संगठन भी इसी तरह युवाओं को आतंक की राह पर ले जाते हैं।
एफसास की विशेषज्ञ योआना बाराकोवा ने कहा, ये संगठन युवाओं को आतंक की राह पर ले जाने के लिए ऑनलाइन मुहिम चला रहे हैं। इसमें युवाओं को गुमराह किया जाता है। इसके लिए डिजिटल प्लेटफार्म पर भ्रामक सामग्री परोसी जा रही है। यही नहीं लोगों की भर्ती के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है। उन्होंने कहा, इंटरनेट की मदद से ही मुंबई हमले का स्वरूप इतना बड़ा हो सका। इंटरनेट की मदद से आतंकियों ने तुरंत फैसले लिए और अपनी साजिश को अंजाम दिया।
एफसास के एक शोधपत्र में दावा किया गया कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के व्यापक इस्तेमाल से चरमपंथ की सीमाओं का विस्तार हुआ है और इससे वैश्विक शांति को बहुत नुकसान पहुंचा है। इसकी मदद से भड़काऊ विचारधारा तेजी से पूरी दुनिया में पहुंचती है और इससे प्रभावित युवा जिहाद के नाम पर दहशत की राह पर निकल पड़ते हैं। इस तरह तकनीकी जानकार लोग भी आतंकी बन जाते हैं। अलकायदा और आईएस जैसे संगठन पश्चिम में मुस्लिमों को भड़काने की साजिश करते हैं और बहुत हद तक सफल भी होते हैं। इसके लिए ऑफलाइन और ऑनलाइन सोशल मीडिया वर्कशॉक की जाती हैं जिनमें दहशतगर्दों को ट्रेनिंग दी जाती है।