पाकिस्तान में बलूचिस्तान सरकार के सलाहकार रह चुके जेन अचकजई ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा कि अगर तालिबान ने रणनीति महत्व की सप्लाई लाइनें जाम कर दीं और सीमाई इलाकों पर काबिज हो गया, तो गनी सरकार टिक नहीं पाएगी। उन्होंने कहा- ‘फिलहाल शक्ति संतुलन तालिबान के पक्ष में झुक गया है। पड़ोसी देश इस संभावित स्थिति को नजरअंदाज नहीं कर सकते। आप चाहे तालिबान को पसंद करें या नहीं, लेकिन हकीकत यही है कि अमेरिका ने अपनी फौज की वापसी के जरिए अफगानिस्तान को एक तश्तरी में रख कर तालिबान को सौंप दिया है।’
अफगानिस्तान के बारे में किताब लिख चुके डेविड मैंसफील्ड ने एशिया टाइम्स से कहा- ‘तालिबान की बॉर्डर क्रॉसिंग्स पर कब्जा जमाने की कोशिशों का मूल्यांकन करने की जरूरत है। मेरी राय में तालिबान केंद्रीय सरकार को उसके घरेलू टैक्स आधार से वंचित कर देना चाहता है।’ इसके पहले एक ट्विट में मैंसफील्ड ने कहा था- ‘ऐसा लगता है कि तालिबान सीमा पार से होने वाले व्यापार पर अफगानिस्तान की निर्भरता का इस्तेमाल कर काबुल स्थित सरकार को बंधक बनाने की कोशिश कर रहा है। अब सवाल है कि क्या पड़ोसी देश व्यापार फिर से शुरू कर तालिबान को सीमा चौकियां संचालित करने वाली वैध ताकत के रूप में स्वीकार करेंगे?’
अफगानिस्तान लगभग 2.24 अरब डॉलर का सोना, फल, पशुओं की त्वचा, और ड्राई फ्रूट का सालाना निर्यात करता है। वह 6.92 अरब डॉलर के खाद्य पदार्थों, पेट्रोलियम पदार्थों, मशीनरी, धातु और उससे बनी चीजों का आयात करता है। ये सारा व्यापार चीन, ईरान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान से लगी सीमाओं के जरिए होता है। अफगानिस्तान से सबसे ज्यादा एक अरब डॉलर का निर्यात संयुक्त अरब अमीरात को होता है। पाकिस्तान, भारत, अमेरिका और चीन को भी वहां से निर्यात होता है। वह सबसे ज्यादा आयात पाकिस्तान और रूस से करता है। इनके अलावा उसके आयात के मुख्य स्रोत उज्बेकिस्तान, ईरान, चीन, तुर्कमेनिस्तान, जापान और कजाखस्तान हैं।