स्थानीय चुनावों में राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) की करारी हार का चीन के प्रति ताइवान की नीति पर गहरा असर होने का अनुमान है। हालांकि ये चुनाव स्थानीय प्रशासन के लिए हुए थे, लेकिन खुद डीपीपी ने इनमें ताइवान को स्वतंत्र देश बनाने की अपनी नीति को मुद्दा बनाया था। पर्यवेक्षकों के मुताबिक त्साई ने इन चुनावों को चीन को सख्त संदेश देने का मौका बनाने की कोशिश की, लेकिन यह दांव उन्हें उलटा पड़ा है।
डीपीपी का अनुमान था कि बीते अगस्त में अमेरिकी कांग्रेस (ससंद) के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव की स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद बने माहौल का फायदा उसे मिलेगा। पेलोसी की यात्रा के बाद ताइवान के आसपास चीन ने जोरदार सैनिक अभ्यास किया था। डीपीपी के रणनीतिकारों के अंदाजा लगाया था कि उससे ताइवान में राष्ट्रवादी भावनाएं उफान पर हैं, इसलिए मतदाता उसके पक्ष में गोलबंद होंगे।
इन चुनावों में विपक्षी कुओ मिन तांग (केएमटी) पार्टी को बड़ी कामयाबी मिली है। केएमटी को चीन के प्रति नरम रुख वाली पार्टी समझा जाता है। डीपीपी जहां स्वतंत्र ताइवान की समर्थक है, वहीं केएमटी अपनी परिभाषा के मुताबिक वन चाइना पॉलिसी को मानती है। उसकी परिभाषा के मुताबिक पूरा चीन एक देश है, जिसकी वैध सत्ताधारी वह है। गौरतलब है कि 1949 में जब चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हुई, तब वहां केएमटी का शासन था। गृह युद्ध में कम्युनिस्ट पार्टी से हारने के बाद केएमटी अपने समर्थकों के साथ भाग कर ताइवान द्वीप पर चली गई थी।
विश्लेषकों के मुताबिक इन चुनाव नतीजों से संकेत मिला है कि मतदाताओं का ध्यान अर्थव्यवस्था और समाज कल्याण जैसे ज्यादातर घरेलू मुद्दों पर ज्यादा टिका हुआ है। ऑस्ट्रेलिया नेशनल यूनिवर्सिटी में ताइवान स्टडीज प्रोग्राम से जुड़े राजनीति-शास्त्री वेन ति सुंग ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘ताइवान के लोग चीन के सैनिक खतरे को लेकर संवेदनशील नहीं रह गए हैँ। इसलिए उन्हें महसूस नहीं हुआ कि ये खतरा उनके लिए सबसे प्रमुख मुद्दा है। पिछले काफी समय से डीपीपी का चीनी खतरे का कार्ड अपना असर खोता चला गया है।’
सुंग ने कहा कि स्थानीय मुद्दों के आधार पर हुए इन नतीजों के आधार पर 2024 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। वैसे उन्होंने कहा- ‘केएमटी अब विपक्ष को एकजुट करने और डीपीपी विरोधी मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद करने की बेहतर स्थिति में आ गई है।’
बीते शुक्रवार को हुए चुनाव में जो उम्मीदवार विजयी हुए, उनमें कम्युनिस्ट क्रांति के समय चीन के शासक रहे च्यांग काई शेक के परपोते च्यांग वान एन भी हैं। वे ताइपे के मेयर चुने गए गए हैं। केएमटी ने ताइवान आने के बाद 1996 तक वहां ‘आयरन हैंड’ से राज किया था। उसके बाद वहां लोकतंत्र कायम हुआ। इसके पहले 1992 में केएमटी चीन के कम्युनिस्ट शासन के साथ एक अघोषित समझौते पर राजी हुई थी, जिसमें सहमति बनी कि चीन की मुख्यभूमि और ताइवान एक ही देश का हिस्सा हैँ। उसी सहमति के तहत दोनों पक्ष इस पर राजी हुए थे कि वे इस वन चाइना पॉलिसी की व्याख्या अपने-अपने ढंग से करने को स्वतंत्र हैं।