ताइवान ने जैविक युद्ध के खिलाफ अपनी रक्षा को मजबूत करने के लिए जैव सुरक्षा अनुसंधान और विकास केंद्रों के निर्माण की अपनी योजना की घोषणा की। हालांकि, इस बात पर जोर दिया गया है कि इस परियोजना में जैविक हथियार विकसित नहीं किए जाएंगे। ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यह योजनाबद्ध निर्माण हाल के वर्षों में अत्यधिक संक्रामक रोगजनकों की वृद्धि की वजह से की जा रही है।
गौरतलब है कि कोरोनावायरस महामारी के पूरी दुनिया में फैलने के बाद चीन की ओर से जैव हथियारों के बनाए जाने के कई दावे हुए थे। इस बीच ताइवान का इस तरह जैविक हथियारों से सुरक्षा के लिए केंद्र बनाना अपने आप में एक चौंकाने वाला घटनाक्रम है। खासकर ऐसे समय, जब चीन पर पारंपरिक युद्ध से इतर गैर-पारंपरिक युद्ध के लिए नए-नए तरह के हथियार बनाने के आरोप लग रहे हैं, जो कि दुश्मनों को युद्ध के मैदान पर चौंकाते हुए पूरी तरह नेस्तनाबूत कर दें।
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'जैव हथियार बनाने की योजना नहीं'
साथ ही ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने उन रिपोर्टों का खंडन किया कि ताइपे को अमेरिका ने हथियारयुक्त जैविक एजेंट विकसित करने के लिए कहा है। मंत्रालय ने बताया कि जिन केंद्रों की योजना बनाई गई है और जो मंत्रालय के चिकित्सा मामलों के ब्यूरो द्वारा बनाई जाएगी, वे द्वीप राष्ट्र में महामारी को रोकने की क्षमता को मजबूत करेंगी।
रक्षा मंत्रालय के चिकित्सा मामलों के ब्यूरो के प्रवक्ता यांग चुंग-ची ने कहा, परमाणु और जैविक युद्ध से निपटने के लिए सेना रक्षा और सुरक्षा पर जोर दे रही है। राष्ट्रीय रक्षा चिकित्सा केंद्र द्वारा पी4 लैब के निर्माण का उद्देश्य मुख्य रूप से बीमारियों और महामारी के रोगजनकों का पता लगाना है ताकि जवाबी उपाय का पता लगाया जा सके। प्रवक्ता ने कहा, बैक्टीरियोलॉजिकल (जैविक) और विषैले हथियारों के विकास, उत्पादन और भंडारण पर प्रतिबंध और उनके विनाश को लेकर समझौता (Convention) पर ताइवान द्वारा हस्ताक्षर किए गए हैं, जो जैविक और विषैले हथियारों के उत्पादन, अधिग्रहण, विकास और प्रतिधारण पर प्रतिबंध लगाता है।
ताइवान की राष्ट्रपति बोलीं- चीन से लगातार कर रहे खतरों का सामना
उन्होंने कहा, हम कभी भी सैन्य उपयोग के लिए जैविक और जहरीले एजेंटों का विकास, निर्माण, भंडारण और अधिग्रहण नहीं करेंगे। ताइवान की राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन ने भी रिपोर्ट को मनगढ़ंत और दुष्प्रचार बताते हुए कहा कि जैव हथियारों के विकास पर चर्चा के लिए कोई बैठक आयोजित नहीं की गई। उन्होंने कहा कि यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि ताइवान को बीजिंग से लगातार खतरों का सामना करना पड़ रहा है, जो द्वीप राष्ट्र को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है।
बता दें कि चीन ने जरूरत पड़ने पर बलपूर्वक इसे वापस अपने नियंत्रण में लेने की कसम खाई है। पिछले साल अगस्त के बाद से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया है क्योंकि चीन द्वारा ताइवान के आसपास सैन्य गतिविधियां तेज कर दी गई हैं, जिसमें मध्य रेखा पर युद्धक विमान भेजना भी शामिल है।