वैज्ञानिकों ने शोध में शामिल 100 बच्चों के मस्तिष्क की एमआरआई जांच की। इसमें पता चला है कि कौन सा बच्चे को ग्यारह साल की उम्र में अवसाद की समस्या होगी। 94 बच्चों की एमआरआई जांच में पता चला कि मस्तिष्क के दो हिस्सों का आपस में कोई खास संबंध नहीं था जिसका काम निर्णय लेना और मूड नियंत्रण करना होता है।
रक्त संचार की प्रक्रिया है अहम
मस्तिष्क के दो हिस्से जिनका काम निर्णय लेना और खुश मिजाजी के लिए होता है। इन दोनों के बीच रक्त संचार तेज रहता है तो ऐसे बच्चों का स्वभाव अच्छा होता है और वे अपने भावनात्मक विचारों पर अच्छा नियंत्रण रखते हैं। जिन बच्चों में रक्त संचार धीमा होता है उनमें अवसाद के लक्षण अधिक दिखते हैं और आने वाले चार साल में स्थिति और खराब होती है।
अध्ययन में वैज्ञानिकों को हर बच्चे में अलग-अलग स्वभाव दिखा। इसमें मुख्य तौर पर बच्चों का परिवार और दोस्तों से दूरी बनाकर रखना, परेशान रहना, चिंतित रहना और शारीरिक रूप से बहुत थका हुआ महसूस करना पाया गया।
इन लक्षणों को जल्द पहचान लें
- बच्चों का अलग रहना, बात न करना
- किसी भी चीज में उनका मन न लगना
- स्कूल और पढ़ाई में मन न लगना
- निराश रहना, बिना कारणा रोते रहना
- फैसला लेने या अपनी बात न कह पाना
भारत में अवसाद ग्रस्त बच्चे
- 4 में से एक बच्चा 13 से 15 की उम्र में अवसाद ग्रस्त है
- 7 फीसदी बच्चे अपनों से तंग होने केचलते अवसाद में चले जाते हैं
- 25 फीसदी किशोर उम्र के युवा अवसाद और निराशा में डूबे रहते हैं
- 11 फीसदी बच्चे तनाव और अवसाद के चलते पढ़ नहीं पाते हैं
- 8 फीसदी बच्चे चिंता में रहने के चलते सो नहीं पाते हैं
- 10 फीसदी बच्चों का कोई अच्छा दोस्त नहीं होता है
(स्रोत: डब्ल्यूएचओ)