फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आसान नहीं है अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया का आगे बढ़ना, 83 फीसदी लोग इस्लामी गणतांत्रिक व्यवस्था के पक्षधर

Thu, 18 Mar 2021 07:56 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल

सार

पीएचडी के मुताबिक इस सर्वे में 40 हजार लोगों से बातचीत की गई। उनमें ज्यादातर लोगों ने माना कि तालिबान के पास अफगानिस्तान पर शासन करने की कोई योजना नहीं है। इसलिए बहुमत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को तालिबान पर दबाव बनाना चाहिए, ताकि वह शांति समझौते को मानने के लिए मजबूर हो...
विज्ञापन
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी - फोटो : Agency (File Photo)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अफगान शांति वार्ता में नई जान फूंकने की नई कोशिशों के बीच जारी हुए एक ताजा जनमत सर्वेक्षण ने सबका ध्यान खींचा है। इस सर्वे के नतीजों को तालिबान के लिए एक झटका समझा गया है। स्थानीय रिसर्च एजेंसी पीस एंड डेमोक्रेसी (पीएचडी) की तरफ से कराए गए इस सर्वे से हालांकि यह सामने आया कि अफगानिस्तान के 83 फीसदी लोग चाहते हैं कि देश में इस्लामी गणतांत्रिक व्यवस्था लागू रहे, लेकिन 90 फीसदी लोगों ने देश के मौजूदा संविधान में आस्था जताई। गौरतलब है कि तालिबान मौजूदा संविधान को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वह देश में पूर्ण इस्लामी व्यवस्था चाहता है।

विज्ञापन


पीएचडी के मुताबिक इस सर्वे में 40 हजार लोगों से बातचीत की गई। उनमें ज्यादातर लोगों ने माना कि तालिबान के पास अफगानिस्तान पर शासन करने की कोई योजना नहीं है। इसलिए बहुमत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को तालिबान पर दबाव बनाना चाहिए, ताकि वह शांति समझौते को मानने के लिए मजबूर हो। सर्वे में शामिल 96 फीसदी लोगों ने कहा कि महिलाओं के बारे में तालिबान की राय आज भी नहीं बदली है। 77 फीसदी लोगों ने कहा कि वे बिना चुनाव के किसी अंतरिम व्यवस्था को अफगानिस्तान पर थोपने का समर्थन नहीं करते।

ये सर्वे रिपोर्ट बुधवार को जारी हुई। गौरतलब है कि मास्को में गुरुवार को आयोजित हो रहे अफगान शांति सम्मेलन का कार्यक्रम कुछ रोज पहले घोषित हुआ था। उससे ठीक पहले आई इस सर्वे रिपोर्ट को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के लिए अच्छी खबर के रूप में देखा गया है। बुधवार को ही गनी ने यह अहम बयान दिया कि वे बिना चुनाव के सत्ता किसी को नहीं सौंपेंगे। विदेश नीति संबंधी एक सेमीनार में उन्होंने कहा कि अगर तालिबान चुनाव के लिए तैयार हो, तो वे तुरंत इसके लिए राजी हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि 42 साल के युद्ध के बाद अब अफगानिस्तान के लोगों को दूसरे “सभ्य देशों की तरह” शांति से रहने का हक है। गनी की इस टिप्पणी को इस बात का संकेत माना गया है कि अगर बिना चुनाव के किसी अंतिरम सरकार को काबुल में बैठाने की कोशिश हुई, तो वो इसका विरोध करेंगे।
विज्ञापन


गनी के सख्त रुख को इस बात से भी जोड़ कर देखा गया है कि रूस की पहल पर आयोजित मास्को वार्ता में अफगानिस्तान के प्रतिनिधि के तौर पर देश की हाई काउंसिल फॉर नेशनल रिकॉन्सिलिएशन के प्रमुख अब्दुल्ला अब्दुल्ला को भी बुलाया गया है। अब्दुल्ला अब्दुल्ला अफगानिस्तान की राजनीति में गनी के प्रतिद्वंद्वी हैं। पिछले राष्ट्रपति चुनाव में मुख्य मुकाबला इन्हीं दोनों नेताओं के बीच हुआ था। अमेरिका ने भी अफगान शांति प्रक्रिया की जो नई योजना घोषित की है, उसमें अब्दुल्ला अब्दुल्ला को जगह दी गई है। इसे इस बात का संकेत माना गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब्दुल्ला को गनी के बराबर अहमियत दे रहा है। इसी के बीच गनी ने अब यह साफ कर दिया है कि अफगानिस्तान में बिना नया चुनाव कराए वे अपना पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

राष्ट्रपति गनी के प्रवक्ता वहीद उमर ने कहा है कि गनी के बयान का अर्थ यह है कि वे अपना कार्यकाल पूरा होने के पहले भी गद्दी छोड़ने को तैयार हैं, लेकिन ऐसा वे बिना नया चुनाव हुए नहीं करेंगे। तालिबान ने राष्ट्रपति के इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। उसके प्रवक्ता जबिहुल्लाह मुजाहिद ने आरोप लगाया कि गनी ने ये बयान शांति प्रक्रिया में रुकावट डालने के मकसद से दिया है। गौरतलब है कि तालिबान इसके पहले कह चुका है कि अफगानिस्तान में इस्लामी व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। विश्लेषकों के मुताबिक ताजे बयान इस बात का संकेत हैं कि अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना और नई वैकल्पिक व्यवस्था लागू करना आसान है।

मास्को सम्मेलन में अफगान प्रतिनिधियों के अलावा चीन, पाकिस्तान और अमेरिकी प्रतिनिधि भी भाग ले रहे हैं। नई अमेरिकी योजना के तहत टर्की में एक बैठक आयोजित करने का एलान किया गया है, जिसमें अमेरिका और अफगान प्रतिनिधियों के अलावा रूस, चीन, ईरान, और भारत को आमंत्रित किया जाएगा।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें