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SC: 'जीने दो बेटी को अपनी जिंदगी', सुप्रीम कोर्ट का माता-पिता का आदेश, कहा- इच्छा के विरुद्ध कैद करना अवैध

Thu, 18 Jan 2024 06:23 AM IST
यशोधन शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शीर्ष अदालत ने उसके माता-पिता को 48 घंटे के भीतर उसके सभी दस्तावेज और सामान वापस करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल जुड़ा हो तो एक दिन की देरी भी मायने रखती है। एक बालिग लड़की को उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 25 वर्षीय एक महिला के माता-पिता को उसे रिहा करने का निर्देश दिया है और उनकी ओर से उसे कैद में रखने को अवैध बताया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि महिला पढ़ी लिखी है और अपना अच्छा-बुरा बेहतर समझ सकती है।

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दुबई में रहने वाले महिला के प्रेमी की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने महिला से बातचीत की। महिला ने अदालत को बताया कि वह दुबई वापस जाना चाहती है और अपना कॅरिअर बनाना चाहती है। उसका पासपोर्ट और अहम दस्तावेज माता-पिता के कब्जे में हैं। उसकी स्थिति लगभग नजरबंद जैसी है।

शीर्ष अदालत ने उसके माता-पिता को 48 घंटे के भीतर उसके सभी दस्तावेज और सामान वापस करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल जुड़ा हो तो एक दिन की देरी भी मायने रखती है। एक बालिग लड़की को उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट की ओर से इस मामले से निपटने के तरीके पर भी नाराजगी व्यक्त की। कहा कि हाईकोर्ट को तत्काल प्रभाव से उसे मुक्त करने का आदेश पारित करना चाहिए था।
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धारा 197 लोक सेवक की हर चूक के लिए सुरक्षा कवच नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों और लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने से संबंधित दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 197 सेवा के दौरान लोक सेवक के प्रत्येक कार्य या चूक पर अपना सुरक्षा कवच नहीं बढ़ाती है। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि यह कवच सिर्फ उन कृत्यों या चूक तक ही सीमित है जो लोक सेवक अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में करते हैं।

पीठ ने धारा 197 की उप-धारा (1) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि जब कोई जज, मजिस्ट्रेट या लोक सेवक जिसे सरकार की अनुमति के बिना पद से नहीं हटाया जा सकता और वह अपने कर्तव्य निर्वहन के दौरान कोई अपराध करता है, तो कोई भी अदालत सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी के बिना ऐसे अपराध का संज्ञान नहीं लेगी। शीर्ष अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने एक सरकारी अधिकारी के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत और आरोपपत्र को रद्द कर दिया था। 

रैलियों के दौरान न हो नफरती भाषण
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को भाजपा नेता टी राजा सिंह को महाराष्ट्र के यवतमाल और छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में हिंदू जनजागृति समिति के तत्वावधान में सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करने पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया। हालांकि, महाराष्ट्र के यवतमाल और छत्तीसगढ़ के रायपुर के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षकों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि उनके अधिकार क्षेत्रों में कोई नफरत भरा भाषण न दिया जाए। साथ ही यदि आवश्यक हो तो कार्यक्रम स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। जपीठ ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि जिस व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाए गए हैं, उसे अदालत के समक्ष कार्यवाही में पक्षकार क्यों नहीं बनाया गया है।

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