सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद में चार साल की मासूम के दुष्कर्म और हत्या के मामले में सोमवार को कहा कि वह पहले जांच से जुड़े सभी दस्तावेज और सबूतों को देखेगा, उसके बाद ही विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाने पर फैसला करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में प्राथमिकी दर्ज करने व जांच के प्रति गाजियाबाद पुलिस के रवैये और आनाकानी पर गहरी चिंता जताई।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यूपी सरकार को निर्देश दिया कि चार्जशीट, स्थिति रिपोर्ट और मामले से जुड़े सभी वीडियो सबूत कोर्ट में पेश किए जाएं। यह सामग्री याचिकाकर्ता को भी दी जाए, ताकि वह जांच में किसी कमी की ओर इशारा कर सके। सीजेआई ने कहा, एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी हुई, जांच में आनाकानी हुई, हर चीज में आनाकानी हुई।
- राज्य सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि मामले में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) की कड़ी धाराओं के तहत चार्जशीट 3 अप्रैल को दाखिल की जा चुकी है और अदालत ने उसका संज्ञान भी लिया है। उन्होंने कहा कि डीएनए जांच के लिए खून व अन्य सैंपल भेजे गए हैं।
- याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील एन हरिहरण ने जांच पर सवाल उठाते हुए कहा कि एफआईआर दर्ज करने में घंटों की देरी हुई और शुरू में हत्या का केस दर्ज किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि दो अस्पतालों ने बच्ची को समय पर भर्ती नहीं किया, जिससे उसकी हालत खराब हो गई। इस पर कोर्ट ने खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। पुलिस से भी जांच में सतर्कता बरतने के लिए कहा।
अस्पतालों को बचाने का प्रयास
पीड़िता के पिता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने कहा, अस्पतालों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। नाबालिग की मौत इसलिए हुई क्योंकि महत्वपूर्ण समय पर चिकित्सा सहायता नहीं दी गई। तर्क दिया, पुलिस ने बयान दर्ज किए हैं कि बच्ची सांस नहीं ले रही थी, लेकिन वीडियो कुछ और ही दिखाता है। घटना 16 मार्च को हुई, पर 17 मार्च सुबह 3:30 बजे तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी। एफआईआर सिर्फ हत्या की दर्ज की गई थी। दुष्कर्म या गंभीर यौन उत्पीड़न का कोई उल्लेख नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने श्रीबांके बिहारी मंदिर के प्रशासन की मौजूदा व्यवस्था में फिलहाल किसी भी तरह का बदलाव करने से इन्कार कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने उत्तर प्रदेश श्रीबांके बिहारी जी ट्रस्ट अध्यादेश, 2025 से जुड़े अहम मामले की सुनवाई भी दो सप्ताह के लिए टाल दी।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं को उच्चाधिकार प्राप्त समिति की स्थिति रिपोर्ट पर जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। पीठ ने कहा, रिपोर्ट याचिकाकर्ताओं को सुनवाई से एक दिन पहले दी गई, इसलिए जवाब के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। याचिकाकर्ताओं व मंदिर के सेवायतों ने समिति के कामकाज पर सवाल उठाए। उनका कहना था, समिति मंदिर की धार्मिक परंपरा में दखल दे रही है। खासतौर पर दर्शन के समय में बदलाव, देहरी पूजा बंद करना और फूल बंगला जैसी पारंपरिक सेवाओं पर शुल्क लगाना गलत और धार्मिक परंपराओं के खिलाफ है।
- याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि मंदिर में वर्षों से मौसम के अनुसार दर्शन की व्यवस्था होती रही है, जो भगवान के जागने व विश्राम से जुड़ी परंपराओं पर आधारित है। देहरी पूजा बहुत पुरानी परंपरा है, जिसे गोस्वामी समुदाय गुरु-शिष्य परंपरा के तहत निभाता है। इसे बंद करना उचित नहीं है, खासकर जब यह पूजा मंदिर बंद होने के समय की जाती है।
- पीठ ने कहा, वह अभी 12 सदस्यीय समिति की व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं करना चाहती। यह समिति हाईकोर्ट पूर्व जज की अध्यक्षता में मंदिर के प्रशासन की देखरेख कर रही है।
- अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि समिति कोर्ट के निर्देशों का पालन करेगी और टकराव की स्थिति पैदा नहीं करेगी।