फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Supreme Court: 'गलत आय प्रमाण पत्र वालों को EWS का लाभ नहीं', उत्तर प्रदेश में भर्ती प्रक्रिया पर अदालत सख्त

Mon, 13 Apr 2026 10:13 PM IST
Himanshu Singh Chandel न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश भर्ती मामले में ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ गलत आय प्रमाण पत्र के आधार पर देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रमाण पत्र सही वित्तीय वर्ष का होना जरूरी है। हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी गई। 
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट। (फाइल) - फोटो : ANI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

उत्तर प्रदेश में भर्ती प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा और सख्त फैसला सामने आया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि गलत या अमान्य आय प्रमाण पत्र के आधार पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस का लाभ नहीं दिया जा सकता। इस फैसले से हजारों अभ्यर्थियों के लिए साफ संदेश गया है कि सरकारी भर्तियों में नियमों का पालन जरूरी है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

विज्ञापन


सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ लेने के लिए आय और संपत्ति का प्रमाण पत्र सही वित्तीय वर्ष का होना जरूरी है। कोर्ट ने पाया कि कई उम्मीदवारों ने ऐसे प्रमाण पत्र लगाए जो या तो गलत वर्ष के थे या फिर वित्तीय वर्ष पूरा होने से पहले जारी किए गए थे। ऐसे में उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता।

क्या था पूरा मामला और क्यों पहुंचे उम्मीदवार कोर्ट?
यह मामला उत्तर प्रदेश में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के 9,000 से ज्यादा पदों की भर्ती से जुड़ा है। कुछ उम्मीदवारों ने ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत आवेदन किया था, लेकिन अंतिम चयन सूची से बाहर कर दिए गए। इसके बाद उन्होंने अदालत का रुख किया और दावा किया कि उनकी गलती नहीं थी, बल्कि प्रमाण पत्र जारी करने में अधिकारियों की चूक थी।
विज्ञापन


क्या हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया गया?
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि उम्मीदवार जरूरी दस्तावेज देने में असफल रहे। अदालत ने कहा कि जब नियम साफ हैं, तो गलत प्रमाण पत्र के आधार पर कोई राहत नहीं दी जा सकती। इस तरह कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

ये भी पढ़ें- होर्मुज पर कब थमेगा तनाव?: ईरान को ट्रंप की खुली धमकी, बोले- नाकाबंदी के नजदीक आए ईरानी जहाज तो तबाह कर देंगे

क्या कोर्ट ने जिम्मेदारी उम्मीदवारों पर डाली?
कोर्ट ने साफ कहा कि उम्मीदवार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। अगर प्रमाण पत्र गलत है तो इसका दोष अधिकारियों पर डालना सही नहीं है। अदालत ने कहा कि उम्मीदवारों के पास सही दस्तावेज बनाने का समय था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसलिए उनकी दलील स्वीकार नहीं की जा सकती।

क्या छोटे-छोटे दस्तावेजी अंतर भी बन सकते हैं कारण?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी भर्तियों में छोटे-छोटे दस्तावेजी अंतर भी बड़ी वजह बन सकते हैं। खासकर जब भर्ती प्रक्रिया बड़े स्तर पर होती है और सिस्टम ऑटोमेटेड होता है। ऐसे में नियमों का सख्ती से पालन जरूरी है ताकि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे।

इस फैसले को भविष्य की भर्तियों के लिए एक अहम मिसाल माना जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में बार-बार चुनौती देने से भर्ती प्रक्रिया में देरी होती है और अन्य उम्मीदवारों पर असर पड़ता है। इसलिए नियमों के पालन में ढिलाई नहीं बरती जा सकती।

अन्य वीडियो-

गाजियाबाद पुलिस का रवैया चिंताजनक : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद में चार साल की मासूम के दुष्कर्म और हत्या के मामले में सोमवार को कहा कि वह पहले जांच से जुड़े सभी दस्तावेज और सबूतों को देखेगा, उसके बाद ही विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाने पर फैसला करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में प्राथमिकी दर्ज करने व जांच के प्रति गाजियाबाद पुलिस के रवैये और आनाकानी पर गहरी चिंता जताई।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यूपी सरकार को निर्देश दिया कि चार्जशीट, स्थिति रिपोर्ट और मामले से जुड़े सभी वीडियो सबूत कोर्ट में पेश किए जाएं। यह सामग्री याचिकाकर्ता को भी दी जाए, ताकि वह जांच में किसी कमी की ओर इशारा कर सके।  सीजेआई ने कहा, एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी हुई, जांच में आनाकानी हुई, हर चीज में आनाकानी हुई।
  • राज्य सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि मामले में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) की कड़ी धाराओं के तहत चार्जशीट 3 अप्रैल को दाखिल की जा चुकी है और अदालत ने उसका संज्ञान भी लिया है। उन्होंने कहा कि डीएनए जांच के लिए खून व अन्य सैंपल भेजे गए हैं।
  • याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील एन हरिहरण ने जांच पर सवाल उठाते हुए कहा कि एफआईआर दर्ज करने में घंटों की देरी हुई और शुरू में हत्या का केस दर्ज किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि दो अस्पतालों ने बच्ची को समय पर भर्ती नहीं किया, जिससे उसकी हालत खराब हो गई। इस पर कोर्ट ने खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। पुलिस से भी जांच में सतर्कता बरतने के लिए कहा। 

अस्पतालों को बचाने का प्रयास  
पीड़िता के पिता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने कहा, अस्पतालों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। नाबालिग की मौत इसलिए हुई क्योंकि महत्वपूर्ण समय पर चिकित्सा सहायता नहीं दी गई। तर्क दिया, पुलिस ने बयान दर्ज किए हैं कि बच्ची सांस नहीं ले रही थी, लेकिन वीडियो कुछ और ही दिखाता है। घटना 16 मार्च को हुई, पर 17 मार्च सुबह 3:30 बजे तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी। एफआईआर सिर्फ हत्या की दर्ज की गई थी। दुष्कर्म या गंभीर यौन उत्पीड़न का कोई उल्लेख नहीं था।
विज्ञापन

श्रीबांके बिहारी मंदिर की व्यवस्था में बदलाव से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने श्रीबांके बिहारी मंदिर के प्रशासन की मौजूदा व्यवस्था में फिलहाल किसी भी तरह का बदलाव करने से इन्कार कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने उत्तर प्रदेश श्रीबांके बिहारी जी ट्रस्ट अध्यादेश, 2025 से जुड़े अहम मामले की सुनवाई भी दो सप्ताह के लिए टाल दी।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं को उच्चाधिकार प्राप्त समिति की स्थिति रिपोर्ट पर जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। पीठ ने कहा, रिपोर्ट याचिकाकर्ताओं को सुनवाई से एक दिन पहले दी गई, इसलिए जवाब के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। याचिकाकर्ताओं व मंदिर के सेवायतों ने समिति के कामकाज पर सवाल उठाए। उनका कहना था, समिति मंदिर की धार्मिक परंपरा में दखल दे रही है। खासतौर पर दर्शन के समय में बदलाव, देहरी पूजा बंद करना और फूल बंगला जैसी पारंपरिक सेवाओं पर शुल्क लगाना गलत और धार्मिक परंपराओं के खिलाफ है।
  • याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि मंदिर में वर्षों से मौसम के अनुसार दर्शन की व्यवस्था होती रही है, जो भगवान के जागने व विश्राम से जुड़ी परंपराओं पर आधारित है। देहरी पूजा बहुत पुरानी परंपरा है, जिसे गोस्वामी समुदाय गुरु-शिष्य परंपरा के तहत निभाता है। इसे बंद करना उचित नहीं है, खासकर जब यह पूजा मंदिर बंद होने के समय की जाती है।
  • पीठ ने कहा, वह अभी 12 सदस्यीय समिति की व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं करना चाहती। यह समिति हाईकोर्ट पूर्व जज की अध्यक्षता में मंदिर के प्रशासन की देखरेख कर रही है।
  • अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि समिति कोर्ट के निर्देशों का पालन करेगी और टकराव की स्थिति पैदा नहीं करेगी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें