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चीन में कंपनियों पर सख्ती: शी और मजदूरों को फायदा, लेकिन अर्थव्यवस्था होगा नुकसान, जानिए पूरा मामला

Sun, 05 Dec 2021 05:17 PM IST
अभिषेक दीक्षित वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग

सार

विश्लेषकों का कहना है कि शी के इस नए विचार से सबसे ज्यादा फायदा विस्थापित मजदूरों को होगा। इसकी वजह यह है कि फैक्टरियों में काम करने वाले मजदूरों को काफी मात्रा में ओवरटाइम का काम मिलता है। इस दौरान उन्हें ज्यादा आमदनी हो जाती है। लेकिन विस्थापित मजदूरों के पास आमदनी बढ़ाने का ऐसा जरिया नहीं होता। देश में ऐसे मजदूरों की संख्या 30 करोड़ है।
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चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ‘साझा समृद्धि’ के विचार का देश के अलग-अलग प्रांतों में गहरा असर देखने को मिल रहा है। इस विचार के तहत न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने का खास अभियान चलाया गया है। कंपनियों ने इसके मुताबिक ज्यादातर प्रांतों में न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी की है। हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने से श्रम लागत बढ़ेगी, जिसकी वजह से कंपनियों के उत्पाद महंगे हो जाएंगे। उस हाल में संभव है कि कई विदेशी कंपनियां चीन में अपना कारोबार समेटने के बारे में सोचने लगेँ।

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वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन के 31 प्रांत स्तरीय क्षेत्रों में से 20 में इस साल न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई जा चुकी है। आर्थिक रूप से चीन का सबसे बड़ा प्रांत ग्वांगदोंग है। वहां इस हफ्ते न्यूनतम मजदूरी 1,620 युवान से 2,360 युवान तक तय करने का एलान किया गया। इसके पहले वहां न्यूनतम मजदूरी 1,410 से 2,200 युवान तक थी। जुलाई 2018 के बाद पहली बार इस प्रांत में न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि की गई है।

चीनी प्रांतों में किसी प्रांत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग न्यूनतम मजदूरी लागू होती है। लेकिन कुल मिला कर न्यूनतम मजदूरी में शेनझेन प्रांत में 7.3 प्रतिशत और ग्वांगझाऊ प्रांत में 9.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जिन कंपनियों को न्यूनतम मजदूरी बढ़ानी पड़ी है, उनमें टोयोटा मोटर, होंडा मोटर, निशान मोटर आदि जैसी विदेशी कंपनियां भी हैँ। इन कंपनियों को सफाई और खाद्य सप्लाई आदि जैसी सेवाएं देने वाले ठेकदारों को भी अपने कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ानी पड़ी है।
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साझा समृद्धि का विचार इसी वर्ष राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पेश किया। बीते अगस्त में सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी से जुड़ी वित्तीय एवं आर्थिक मामलों की समिति बैठक में उन्होंने अपना यह विचार रखा था। उस दौरान दिए अपने भाषण में शी ने कहा था कि देश में आमदनी के पुनर्वितरण की जरूरत है, ताकि साझा समृद्धि के विचार को हकीकत में बदला जा सके। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक उसके तुरंत बाद प्रांतों में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की होड़ लग गई। आधे प्रांतों में तो सितंबर तक ही इसमें वृद्धि का एलान कर दिया गया था।

विश्लेषकों का कहना है कि शी के इस नए विचार से सबसे ज्यादा फायदा विस्थापित मजदूरों को होगा। इसकी वजह यह है कि फैक्टरियों में काम करने वाले मजदूरों को काफी मात्रा में ओवरटाइम का काम मिलता है। इस दौरान उन्हें ज्यादा आमदनी हो जाती है। लेकिन विस्थापित मजदूरों के पास आमदनी बढ़ाने का ऐसा जरिया नहीं होता। देश में ऐसे मजदूरों की संख्या 30 करोड़ है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि साझा समृद्धि के विचार पर अमल सुनिश्चित करवा कर शी ने देश में अपनी लोकप्रियता काफी बढ़ा ली है। इससे अगले साल कम्युनिस्ट पार्टी के महाधिवेशन में उन्हें लाभ होगा। ये साफ हो चुका है कि शी अगले अधिवेशन में तीसरे कार्यकाल के लिए महासचिव बनने की कोशिश करेंगे। लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि बढ़ रही न्यूनतम मजदूरी से इस कोशिश में भले शी जिनपिंग को लाभ हो, लेकिन इससे कारोबारियों की मुश्किल बढ़ गई है। इसका नुकसान चीन की अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ सकता है। 

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