देश में महंगाई के मुद्दे पर बढ़ रहा लोगों का गुस्सा राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। लोगों को संतुष्ट करने के लिए राजपक्षे सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि अगर देश की आर्थिक स्थिति में बुनियादी सुधार नहीं हुआ, तो इन कदमों से थोड़े समय के लिए ही राहत मिलेगी।
बढ़ेगा राजकोष पर दबाव
राष्ट्रपति राजपक्षे ने एक बिलियन डॉलर के राहत पैकेज का एलान किया है। इसके तहत सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन में बढ़ोतरी की गई है। साथ ही खाद्य पदार्थों और दवाओं पर से कई टैक्स हटा लिए गए हैं। गरीब तबकों को नकदी सहायता देने की घोषणा भी की गई है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इन उपायों से श्रीलंका के राजकोष पर दबाव और बढ़ेगा। बढ़ते राजकोषीय घाटे के बीच महंगाई पर काबू पाना और मुश्किल हो जाएगा।
इसी हफ्ते घोषित हुआ पैकेज श्रीलंका के सकल घरेलू उत्पाद के 1.2 फीसदी के बराबर है। सरकार ने 2022 के लिए 3.9 खरब रुपये का बजट पेश किया था। वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे ने कहा है कि राहत पैकेज के लिए रकम बजट के अंदर से ही जुटाई जाएगी। यानी उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि इस खर्च से राजकोष पर नया बोझ नहीं पड़ेगा। लेकिन वित्तीय विशेषज्ञ इस दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि चूंकि सरकार ने कोई नया टैक्स लगाने का फैसला नहीं किया है, इसलिए राहत पैकेज के लिए बजट के अंदर से धन जुटाना बेहद मुश्किल साबित होगा।
श्रीलंका के विपक्षी दली दलों ने राहत पैकेज की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि असल समस्या विदेशी मुद्रा की कमी और बढ़ रही महंगाई दर की है। महंगाई दर बीते दिसंबर 12.1 फीसदी तक पहुंच गई। विपक्ष का कहना है कि इस बुनियादी समस्या के समाधान के लिए सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। पूर्व आर्थिक सुधार मंत्री और समगी जना बालावेगारा पार्टी के नेता हर्षा डि सिल्वा ने वेबसाइट ब्लूमबर्ग कहा- ‘सरकार न तो विदेशी मुद्रा की कमी का हल ढूंढ रही है और न ही महंगाई का। अब उसने वेतन बढ़ा दिया है। अगर ये रकम नोट छाप कर जुटाई गई तो उससे मुद्रास्फीति दर और बढ़ेगी।’
कोरोना के बाद बढ़ी आर्थिक दिक्कतें
श्रीलंका की आर्थिक समस्याएं कोरोना महामारी आने के बाद से बढ़ती गई हैं। श्रीलंका के लिए विदेशी मुद्रा की कमाई का प्रमुख स्रोत पर्यटन उद्योग है। महामारी के दौरान ये उद्योग लगभग ठप हो गया है। इससे पैदा हुई समस्या के बीच अब देश में ये बहस शुरू हो गई है कि क्या श्रीलंका सरकार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आपातकालीन कर्ज की गुजारिश करनी चाहिए या उसे चीन और भारत से मिलने वाली सहायता पर ही निर्भर रहना चाहिए।
इस साल श्रीलंका की मुसीबत और बढ़ने का अंदेशा है। अगले 18 जनवरी को 50 करोड़ डॉलर के बॉन्ड मैच्योर हो जाएंगे। अगले जुलाई में एक अरब डॉलर के बॉन्ड मैच्योर होंगे। यानी इतनी रकम श्रीलंका सरकार को चुकानी होगी। जबकि फिलहाल श्रीलंका के पास सिर्फ 3.1 अरब डॉलर की ही विदेशी मुद्रा है।