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श्रीलंका: कनाडा के शीर्ष राजनयिक तलब, पूर्व राष्ट्रपतियों समेत चार पर प्रतिबंध लगाने पर जताई नाराजगी

Wed, 11 Jan 2023 04:52 PM IST
निर्मल कांत वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो

सार

कनाडा ने मंगलवार को देश के गृह युद्ध के दौरान मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के लिए पूर्व राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे, महेंद्र राजपक्षे समेत चार श्रीलंकाई अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाए। 
 
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गोतबया राजपक्षे, महिंदा राजपक्षे - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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कनाडा ने मंगलवार को श्रीलंका के दो पूर्व राष्ट्रपतियों समेत चार राज्य अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। एक दिन बाद यहां कनाडा के शीर्ष राजनयिक को तलब किया और उनके देश के फैसले पर नाराजगी व्यक्त की। द्वीप राष्ट्र ने प्रतिबंध लगाने वाले इस आदेश को एकतरफा कार्रवाई बताया है। 

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कनाडा ने मंगलवार को देश के गृह युद्ध के दौरान मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के लिए पूर्व राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे, महेंद्र राजपक्षे समेत चार श्रीलंकाई अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाए। 

प्रतिबंधों पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कोलंबो में कनाडा के कार्यवाहक उच्चायुक्त को तलब किया और इस कदम पर सरकार की नाराजगी व्यक्त की। 
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मंत्रालय ने एक ट्वीट में कहा, विदेश मंत्री अली साबरी ने कनाडा के कार्यवाहक उच्चायुक्त डैनियल बूड को विदेश मंत्रालय में तलब किया है और श्रीलंका के दो पूर्व राष्ट्रपतियों सहित चार व्यक्तियों के खिलाफ बेबुनियादी आरोपों के आधार पर एकतरफा प्रतिबंधों की घोषणा पर सरकार की गहरी नाराजगी व्यक्त किया। 

इससे पहले विदेश मामलों के राज्य मंत्री तारका बालासुरिया ने कहा, राजपक्षे भाइयों पर प्रतिबंध लगाने का कनाडा का फैसला ऐसे समय में आया है, जब श्रीलंका युद्ध के बाद की सुलह प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा, यह दिखाता है कि हमारे वास्तविक दोस्त कौन हैं और कौन नहीं। 
 
कनाडा सरकार ने नागरिक संघर्ष में मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के लिए पूर्व राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे और महिंदा राजपक्षे, उनके स्टाफ के कर्मचारी सुनील रत्नायके और लेफ्टिनेंट कमांडर चंदना पी. हेत्तियारचिथे समेत श्रीलंका के चार राज्य अधिकारियों के खिलाफ प्रतिबंध लगाया है। 

श्रीलंका की बहुसंख्यक सिंहली आबादी ने 1983 से 2009 तक चले 26 साल के गृहयुद्ध के बाद तमिल अलगाववादियों को हराने के लिए राजपक्षे भाइयों का समर्थन किया था।

2009 में श्रीलंकाई सेना द्वारा अपने सर्वोच्च नेता वी प्रभाकरन की हत्या के बाद श्रीलंका के पतन से पहले लिट्टे ने द्वीप राष्ट्र के उत्तरी और पूर्वी प्रांतों में एक अलग तमिल मातृभूमि के लिए एक सैन्य अभियान चलाया था।

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