रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बनाए जाने से श्रीलंका में पैदा हुई उम्मीदें अब टूट रही हैं। राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे ने बीते 12 मई को विपक्षी दल के नेता विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। तब ये आस जगी थी कि विक्रमसिंघे अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों का इस्तेमाल करते हुए श्रीलंका को जल्द राहत दिलवा सकेंगे। खासकर यह उम्मीद जगी थी कि विक्रमसिंघे कच्चे तेल, रसोई गैस, और दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करवाएंगे।
वेबसाइट इकॉनमीनेक्स्ट.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक तेल की कीमत लगातार चढ़ने के साथ श्रीलंका में परिवहन का इस्तेमाल एक बड़ी चुनौती बन गया है। उधर आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनाज के लिए मोहताज है। मरीजों और बुजुर्गों के लिए जरूरी दवा हासिल करना पहले जितना ही कठिन बना हुआ है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक विक्रमसिंघे को इस बात का श्रेय जरूर दिया जाएगा कि उन्होंने देश की विकट स्थिति की पूरी जानकारी जनता को दी है। उन्होंने यह खुल कर बताया है कि देश पर कितना विदेशी कर्ज है। साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ-साथ भारत, चीन, और जापान जैसे मित्र देशों से सहायता पाने की गंभीर कोशिशें की हैं। लेकिन इन कोशिशों का अभी पर्याप्त परिणाम नहीं निकला है।
प्रधानमंत्री बनने के पहले विक्रमसिंघे लगातार इस बात की वकालत कर रहे थे कि श्रीलंका को सरकार को आईएमएफ के पास जाना चाहिए। उनकी सरकार ने इस दिशा में गंभीर पहल की। लेकिन देश की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि आईएमएफ से सहायता मिलना कठिन साबित हो रहा है। विक्रमसिंघे ने कहा है कि श्रीलंका को कर्ज डिफॉल्ट नहीं करना चाहिए था। पूर्व सरकार के उस कदम से देश की साख खत्म हो गई। इसलिए अब आईएमएफ से कर्ज पाना बहुत मुश्किल हो गया है।
जानकारों के मुताबिक ‘क्राइसिस प्राइम मिनिस्टर’ नाम से चर्चित विक्रमसिंघे के इस आकलन में दम है। लेकिन देश के परेशान लोग तुरंत राहत चाहते हैँ। अब ये अंदेशा गहरा रहा है कि अगर विक्रमसिंघे सरकार जरूरी चीजों की सप्लाई के इंतजाम जल्द नहीं कर पाई, तो वर्तमान प्रधानमंत्री के खिलाफ भी जन असंतोष भड़क उठेगा। तब संभवतः श्रीलंका अभी से भी ज्यादा गहरी राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो जाएगा।