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Sri Lanka Crisis: राष्ट्रपति विक्रमसिंघे की अलोकप्रियता बहुत भारी पड़ रही है श्रीलंका को

Fri, 29 Jul 2022 01:45 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो

सार

Sri Lanka Crisis: जनता के एक बड़े हिस्से की निगाह में रानिल विक्रमसिंघे को राजपक्षे का परिवार के नुमाइंदे के रूप में ही देखा जा रहा है। विश्लेषकों की राय है कि जब तक राजनीतिक स्थिरता को लेकर अंतरराष्ट्रीय भरोसा पैदा नहीं होता, श्रीलंका के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसी एजेंसियों से कर्ज पाना मुश्किल बना रहेगा
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Sri Lanka Crisis: Ranil Wickremesinghe sworn-in new Sri Lankan President - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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श्रीलंका में राजनीतिक अस्थिरता के जारी माहौल से अब देश का भविष्य प्रभावित हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय कर्जदाता एजेंसियों और निवेशकों में अभी तक यह भरोसा पैदा नहीं हुआ है कि राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे की सरकार टिकाऊ होगी। हालांकि संसद में सरकार के पक्ष में भारी बहुमत देखने को मिला, लेकिन राजनीतिक हलकों में सरकार की साख पर सवाल लगातार बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच के ताजा आकलन में यही राय जाहिर हुई है।   

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फिच ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट मे कहा है- ‘विक्रमसिंघे सरकार की संसदीय स्थिति मजबूत नजर आती है, लेकिन जन समर्थन के लिहाज से ये सरकार कमजोर है। संसद और सरकार पर श्रीलंका पीपुल्स फ्रीडम एलायंस के नेताओं का दबदबा है, जिनका राजपक्षे परिवार से निकट संबंध रहा है। इसलिए अगर जल्द आर्थिक स्थिति नहीं सुधरी, तो मौजूदा सरकार के खिलाफ ऐसे जन प्रदर्शनों का जोखिम कायम है, जिससे आगे और अस्थिरता पैदा हो सकती है।’
 

 

रानिल विक्रमसिंघे को पूर्व राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे ने प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। इस कारण वे भी सरकार विरोधी आंदोलनकारियों के निशाने पर आ गए थे। इसी आंदोलन के कारण राजपक्षे को देश छोड़ कर भागना पड़ा। उसके बाद विक्रमसिंघे को संसद ने नया राष्ट्रपति चुना। लेकिन जनता के एक बड़े हिस्से की निगाह में उन्हें राजपक्षे का परिवार के नुमाइंदे के रूप में ही देखा जा रहा है।

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विश्लेषकों की राय है कि जब तक राजनीतिक स्थिरता को लेकर अंतरराष्ट्रीय भरोसा पैदा नहीं होता, श्रीलंका के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसी एजेंसियों से कर्ज पाना मुश्किल बना रहेगा। आईएमएफ ने आगे कर्ज देने के लिए कड़ी शर्तें लगाई हैं। समझा जाता है कि उन शर्तों को अगर सरकार ने स्वीकार किया, तो उससे विक्रमसिंघे प्रशासन और भी ज्यादा अलोकप्रिय हो जाएगा। आईएमएफ की शर्तों में देश के अंदर टैक्स बढ़ाना, सरकारी खर्च घटाना, और मुद्रा विनिमय दर में अधिक लचीलापन लाना शामिल है।
 

फिच ने कहा है कि अगर आईएमएफ से करार नहीं हो सका, तो निकट भविष्य में श्रीलंका की अंतरराष्ट्रीय हैसियत बेहद दबाव में आ जाएगी। फिलहाल देश के पास विदेशी मुद्रा की भारी कमी है। इसलिए वह जरूरत के मुताबिक ईंधन, खाद्य पदार्थों और दवाओं का आयात नहीं कर रहा है। जून के आखिर तक श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भंडार में सिर्फ 1.9 बिलियन डॉलर की रकम थी, जो सिर्फ एक महीने के आयात के ही योग्य थी।
 

आईएमएफ यह कह चुका है कि श्रीलंका इस स्थिति में नहीं है कि वह खुद पर पहले से मौजूद कर्ज को चुका सके। श्रीलंका ने बीते अप्रैल में खुद डिफॉल्टर (कर्ज चुका पाने में अक्षम) घोषित कर दिया था। आईएमएफ ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कर्जदाता संस्थाएं तभी आगे कर्ज देंगी, अगर उन्हें श्रीलंका के कर्ज चुका पाने की क्षमता पर यकीन हो। अब फिच ने भी श्रीलंका के कर्ज चुकाने की क्षमता पर गंभीर संदेह जता दिया है। विश्लेषकों की राय में यह इस बात का संकेत है कि श्रीलंका के लिए तब तक नया कर्ज पाना मुश्किल बना रहेगा, जब तक यहां की सरकार जन समर्थन हासिल करने में नाकाम बनी रहती है।

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