श्रीलंका का राष्ट्रपति निवास अभी भी यहां लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा है। हमेशा कड़ी सुरक्षा के बीच रहने वाली ये जगह बीते हफ्ते आम जनता के लिए खुल गई। नौ जुलाई को सैकड़ों की संख्या में सरकार विरोधी आंदोलनकारी धावा बोलते हुए इसमें घुस गए। तब आम जन को मालूम हुआ कि इस निवास के भीतर राष्ट्रपति का परिवार किस शान-ओ-शौकत और ऐश-ओ-आराम के साथ रहता था। श्रीलंकाई लेखक असंगा अबेयगुनासेकरा ने एक टीवी चैनल से कहा कि यह देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति का घर था। इसे आम जनता के लिए पहले कभी नहीं खोला गया था।
देश से भागने के बाद गोतबया राजपक्षे ने राष्ट्रपति पद से अपना इस्तीफा श्रीलंकाई संसद के स्पीकर को भेज दिया। इस बारे में अबेयगुनासेकरा ने कहा कि उनके पास इस्तीफा देने का ही एकमात्र विकल्प बचा था। यहां लोग थके हुए और भूखे हैं। वे गुस्से से उबल रहे हैं। वे बदलाव की मांग कर रहे हैं। सत्ताधारियों से आजीज आ चुके ये लोग अब उनकी जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं। राजपक्षे चले गए, लेकिन श्रीलंका का वित्तीय संकट अभी उसी तरह कायम है। बल्कि हालात बदतर होते जा रहे हैं। बिजली की कटौती बढ़ गई है, ईंधन और महंगा हो गया है। अनाज और दवाओं की कमी बनी हुई है। इन सबको लेकर विरोध प्रदर्शनों का दौर भी जारी है। गुनासेकरा ने कहा कि फिलहाल यहां शून्य राजनीतिक स्थिरता है। हमने दो महीनों में तीन मंत्रिमंडल देखे और अब चौथा बनने जा रहा है। जरूरत आम हालत बहाल करने के लिए जरूरी कदम उठाने की है।
कोलंबो स्थित राजनीतिक विश्लेषक अमिता अरुदप्रगासम ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा कि अनाज, दवाओं और ईंधन का अभाव बना हुआ है। सरकारी नीतियां बेअसर और भ्रामक साबित हुई हैं। अरुदप्रगासम ने कहा कि यह एक टाइम बम की तरह था। सरकार धनी लोगों और कॉरपोरेट सेक्टर को टैक्स में बड़ी कटौती दे रही थी, जबकि उसे टैक्स बढ़ाने की नीति अपनानी चाहिए थी। टैक्स से मिले धन का निवेश आम जन में किया जा सकता था और उससे कर्ज चुकाया जा सकता था। राजपक्षे ने किसी की सलाह नहीं सुनी। उनके सलाहकार ऐसे थे, जो नहीं जानते थे कि श्रीलंका जैसे देश की अर्थव्यवस्था कैसे काम करती है।
यहां आम लोग कहते सुने जाते हैं कि संकट के इस काल में श्रीलंका को तुरंत मानवीय सहायता की जरूरत है। इस महीने का आरंभ में प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने स्वीकार किया था कि देश दिवालिया हो चुका है। विक्रमसिंघे से यहां लोगों को कोई उम्मीद नहीं है। बल्कि आम राय यह है कि वे राजपक्षे से मिले हुए हैं और उनके हितों की रक्षा कर रहे हैं।
मानव अधिकार कार्यकर्ता और वकील अंबिका सतकुननथन ने सीएनएन से कहा कि आंदोलन धीमा नहीं हो रहा है। अब श्रीलंका के बहुत से नागरिकों ने सत्ताधारियों को जवाबदेह बनाने में अपनी भूमिका समझ ली है। राजपक्षे डूबती जहाज को छोड़ भागे। लेकिन अब एक उम्मीद की किरण भी जगी है। यह बदलाव का समय है।
सेना ने जारी की सफाई
इस बीच श्रीलंकाई सेना ने कहा कि श्रीलंका लाइट इन्फैंट्री के ब्रिगेडियर अनिल सोमवीरा को निलंबित नहीं किया गया है। वे 13 जुलाई को ड्यूटी पर थे। इसी दिन प्रधानमंत्री कार्यालय पर प्रदर्शनकारियों द्वारा कब्जा कर लिया गया था। डेली मिरर के हवाले से सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर नीलांथा प्रेमरत्न ने कहा कि ब्रिगेडियर सोमवीरा के निलंबन की खबर झूठी थी। सेना के प्रवक्ता ने कहा कि ब्रिगेडियर सोमवीरा को सेना मुख्यालय सौंपा गया है।