श्रीलंका के मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक संकट के बीच राजपक्षे परिवार घिरा नजर आता है। इसके बावजूद श्रीलंकाई राजनीति के ज्यादातर जानकारों के मुताबिक यह मान लेना गलत होगा कि राजपक्षे परिवार का सूर्यास्त हो गया है। प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद महिंदा राजपक्षे कुछ समय तक सीन से गायब रहे। लेकिन पिछले हफ्ते अचानक वे संसद में उपस्थित हुए। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इसके जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि उनके राजनीतिक करियर को खत्म न समझा जाए।
समझा जाता है कि राजपक्षे परिवार के सदस्यों ने फिलहाल लो प्रोफाइल में रहने का फैसला किया है। जो लोग अभी सीन से बाहर हैं, उनमें बासिल राजपक्षे भी हैं, जो मौजूदा संकट शुरू होने के पहले देश के वित्त मंत्री थे। बासिल राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे और प्रधानमंत्री महिंद राजपक्षे के भाई हैँ। एक रिपोर्ट के मुताबिक राजपक्षे खानदान में 39 व्यक्ति हैं, जो किसी ना किसी रूप में सत्ता से जुड़े रहे हैँ।
हाल तक राजपक्षे परिवार के छह सदस्य सरकारी पदों पर थे। उनके अधिकार क्षेत्र में देश का लगभग 70 फीसदी बजट था। अभी सिर्फ गोटबया ही सत्ता में हैं। इस परिवार का प्रभाव कायम करने का श्रेय 72 वर्षीय महिंदा राजपक्षे को दिया जाता है। उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत एक सैनिक अधिकारी के रूप में की थी। बाद में वे राजनीति में आए।
उधर कम से दो बार राजपक्षे परिवार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। राजपक्षे परिवार से जुड़े जलिया विक्रमसूरिया को अमेरिका में श्रीलंका दूतावास के लिए जायदाद खरीदने के मामले में तीन लाख 30 डॉलर की धोखाधड़ी का दोषी पाया गया था। उधर पंडोरा पेपर्स में राष्ट्रपति की भतीजी और पूर्व उप मंत्री निरुपमा राजपक्षे और उनके पति का नाम आया था। उन पर फर्जी कंपनियों के जरिए टैक्स हैवेन्स में धन जमा कराने का आरोप लगा था।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक इन सभी मौकों पर राजपक्षे परिवार अपनी हैसियत बचाने में सफल रहा। इस बात उसके सामने मुश्किल चुनौती है। लेकिन जानकार इसे असंभव नहीं मानते। यहां राजनीतिक विश्लेषकों में ये जुमला अक्सर बोला जा रहा है कि राजपक्षे परिवार अभी भले डाउन हुआ हो, लेकिन वह आउट नहीं हुआ है।