नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति के बावजूद श्रीलंका में सरकार विरोधी प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे अपना पद नहीं छोड़ते, वे अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। राजपक्षे ने पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी यूनाइटेड नेशनल पार्टी के नेता रानिल विक्रमसिंघे को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। इसके पहले उनके भाई महिंद राजपक्षे ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक विक्रमसिंघे के सामने सबसे पहली चुनौती अपने मंत्रिमंडल का गठन करना है। संसद में अपनी पार्टी के अकेले सदस्य वे ही हैं। उनके अलावा 225 सदस्यीय सदन में राजपक्षे की पार्टी के लगभग 100 सदस्य हैं। विपक्षी दलों के 58 सदस्य हैँ। बाकी सभी सदस्य निर्दलीय हैं। विक्रमसिंघे ने सर्वदलीय सरकार बनाने की पहल की है। लेकिन उनकी ये कोशिश सफल होती नहीं दिख रही है।
अरुलथस ने ध्यान दिलाया है कि विक्रमसिंघे की नियुक्ति को मोटे तौर पर राष्ट्रपति गोटबया की अपना पद बचाए रखने की चाल के रूप में देखा गया है। अरुलथस ने लिखा है- ‘इस कदम से गोटबया ने उम्मीद की है कि विरोध प्रदर्शन आखिरकार थम जाएंगे। लेकिन इससे आंदोलनकारियों के संतुष्ट होने की संभावना नहीं है। वे राष्ट्रपति को हटाने की अपनी मांग पर अडिग हैं।’
विश्लेषकों के मुताबिक विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत के बाद ही राजपक्षे परिवार के सारे दांव उलटे पड़े हैं। अपनी गलतियों से उन्होंने मध्यमार्गी लोगों को भी अपना विरोधी बना लिया है। ऐसे विक्रमसिंघे की ढाल लंबे समय तक राष्ट्रपति को बचा पाएगी, इसकी संभावना कम मानी जा रही है।