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श्रीलंका आर्थिक संकट: गोटबया राजपक्षे के लिए कारगर नहीं हो रहा है विक्रमसिंघे को ढाल बनाने की चाल

Sat, 14 May 2022 03:45 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो

सार

ज्यादातर लोगों को रानिल विक्रमसिंघे से कोई खास उम्मीद नहीं है। रानिल इसके पहले पांच बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं, हालांकि कभी भी वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। इस बार वे उस समय प्रधानमंत्री बने हैं, जब देश गहरे आर्थिक और वित्तीय संकट में हैं। आंदोलनकारियों की राय में इस हाल के लिए राजपक्षे परिवार का कुप्रबंधन और गलत नीतियां जिम्मेदार हैं...
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नए प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे शपथ लेते हुए। - फोटो : Agency
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विस्तार
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नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति के बावजूद श्रीलंका में सरकार विरोधी प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे अपना पद नहीं छोड़ते, वे अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। राजपक्षे ने पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी यूनाइटेड नेशनल पार्टी के नेता रानिल विक्रमसिंघे को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। इसके पहले उनके भाई महिंद राजपक्षे ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

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कोलंबो में प्रमुख विरोध स्थल पर सैकड़ों प्रदर्शनकारी अभी भी जमे हुए हैं। इनमें एक चमालांगे शिवाकुमार ने टीवी चैनल अल-जजीरा से कहा- ‘जब हमें इंसाफ मिल जाएगा, तब हम अपना संघर्ष समाप्त कर देंगे।’ विरोध स्थल पर मौजूद ज्यादातर लोगों को रानिल विक्रमसिंघे से कोई खास उम्मीद नहीं है। रानिल इसके पहले पांच बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं, हालांकि कभी भी वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। इस बार वे उस समय प्रधानमंत्री बने हैं, जब देश गहरे आर्थिक और वित्तीय संकट में हैं। आंदोलनकारियों की राय में इस हाल के लिए राजपक्षे परिवार का कुप्रबंधन और गलत नीतियां जिम्मेदार हैं।

मंत्रिमंडल का गठन बड़ी चुनौती

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक विक्रमसिंघे के सामने सबसे पहली चुनौती अपने मंत्रिमंडल का गठन करना है। संसद में अपनी पार्टी के अकेले सदस्य वे ही हैं। उनके अलावा 225 सदस्यीय सदन में राजपक्षे की पार्टी के लगभग 100 सदस्य हैं। विपक्षी दलों के 58 सदस्य हैँ। बाकी सभी सदस्य निर्दलीय हैं। विक्रमसिंघे ने सर्वदलीय सरकार बनाने की पहल की है। लेकिन उनकी ये कोशिश सफल होती नहीं दिख रही है।

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विपक्ष के वरिष्ठ नेता हर्षा डी सिल्वा ने विक्रमसिंघे मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री बनने का प्रस्ताव ठुकरा दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि वे मौजूदा सरकार के इस्तीफे की अपनी मांग पर कायम हैं। उन्होंने एक बयान में कहा- इस मौके पर लोग सियासी खेल और सौदेबाजी की मांग नहीं कर रहे हैं। वे नए सिस्टम की मांग कर रहे हैं, जो उनके भविष्य को सुरक्षित कर सके।

डी सिल्वा और उनकी पार्टी समगी जना बालावेगया (एसजेबी) ने घोषणा की है कि वे राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे को हटाने के लिए चल रहे ‘जन संघर्ष’ में शामिल होंगे। वे किसी ऐसे समाधान का समर्थन नहीं करेंगे, जिसके तहत गोटबया राष्ट्रपति बने रहें।

यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में श्रीलंका मामलों के जानकार मारियो अरुलथस ने अल-जजीरा की वेबसाइट पर लिखी एक टिप्पणी में कहा है कि सरकार परिवर्तन श्रीलंका की समस्याओं का हल नहीं है। जब तक वहां की राज्य व्यवस्था का पुनर्गठन नहीं होता, पिछली गलतियों को दोहराए जाने की गुंजाइश बनी रहेगी।

राष्ट्रपति को हटाने की मांग पर अड़े

अरुलथस ने ध्यान दिलाया है कि विक्रमसिंघे की नियुक्ति को मोटे तौर पर राष्ट्रपति गोटबया की अपना पद बचाए रखने की चाल के रूप में देखा गया है। अरुलथस ने लिखा है- ‘इस कदम से गोटबया ने उम्मीद की है कि विरोध प्रदर्शन आखिरकार थम जाएंगे। लेकिन इससे आंदोलनकारियों के संतुष्ट होने की संभावना नहीं है। वे राष्ट्रपति को हटाने की अपनी मांग पर अडिग हैं।’

विश्लेषकों के मुताबिक विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत के बाद ही राजपक्षे परिवार के सारे दांव उलटे पड़े हैं। अपनी गलतियों से उन्होंने मध्यमार्गी लोगों को भी अपना विरोधी बना लिया है। ऐसे विक्रमसिंघे की ढाल लंबे समय तक राष्ट्रपति को बचा पाएगी, इसकी संभावना कम मानी जा रही है।

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