फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सांसों का संकट: अब गंभीरता से शुरू हो गई हैं चंद्रमा की ऑक्सीजन को धरती पर लाने की कोशिशें

Tue, 16 Nov 2021 07:37 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कैनबरा

सार

ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक जॉन ग्रांट का दावा है कि अगर चंद्रमा पर मौजूद सख्त चट्टानों को छोड़ भी दिया जाए, तब भी वहां की पथरीली सतह के अंदर मौजूद ऑक्सीजन तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। ग्रांट ने कहा है कि चंद्रमा पर ऐसे खनिज पदार्थ भरपूर मात्रा में मौजूद हैं, जिनके अंदर ऑक्सीजन मौजूद रहती है...
विज्ञापन
चांद पर इंसान - फोटो : Pixabay
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

चंद्रमा की सतह पर यानी उसके ऊपरी वातावरण में इतनी ऑक्सीजन नहीं है, जितना मनुष्य के जीवित रहने के लिए जरूरी होती है। लेकिन चंद्रमा की पथरीली सतह के अंदर भरपूर ऑक्सीजन है। ये मात्रा इतनी ज्यादा है कि उससे आठ अरब मनुष्यों की एक लाख साल तक की सांस लेने की जरूरत पूरी हो सकती है। ये बात ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक जॉन ग्रांट ने बताई है। इसी हफ्ते कन्वर्सेशन नाम की पत्रिका में लिखे एक लेख में उन्होंने इस बारे में विस्तार जानकारी जानकारी दी।

विज्ञापन


जॉन ग्रांट ऑस्ट्रेलिया की सदर्न क्रॉस यूनिवर्सिटी में मृदा विज्ञान (सॉयल साइंस) के प्रोफेसर हैं। उनका दावा है कि अगर चंद्रमा पर मौजूद सख्त चट्टानों को छोड़ भी दिया जाए, तब भी वहां की पथरीली सतह के अंदर मौजूद ऑक्सीजन तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। ग्रांट ने कहा है कि चंद्रमा पर ऐसे खनिज पदार्थ भरपूर मात्रा में मौजूद हैं, जिनके अंदर ऑक्सीजन मौजूद रहती है।

रोज 800 ग्राम ऑक्सीजन चाहिए

ग्रांट ने अनुमान लगाया है कि एक मनुष्य को जीवित रहने के लिए रोज 800 ग्राम ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है। उधर चंद्रमा की पथरीली सतह 10 मीटर गहरी है। इस सतह में 45 फीसदी हिस्सा ऑक्सीजन का है। ऑक्सीजन की समृद्ध मात्रा की वजह से ही इस सतह से सिलिका, एल्यूमिनियम, लौह और मैग्नेशियम ऑक्साइड जैसे खनिज मजबूती से चिपके रहते हैं।

ग्रांट के मुताबिक पथरीली सतह का ऊपरी हिस्सा ऐसा नहीं है, जहां सांस लेने लायक स्थिति हो। लेकिन सतह के अंदर छिपी ऑक्सीजन को निकाला जा सकता है। ऐसा करने की प्रक्रिया आसान है। लेकिन इसमें मुश्किल यह है कि इस प्रक्रिया में काफी मात्रा में ऊर्जा की खपत होती है। इसलिए ये काम आसानी से तभी हो सकता है, जब चंद्रमा पर ही सौर ऊर्जा या वहां मौजूद ऊर्जा के दूसरे स्रोतों का इस्तेमाल करना संभव हो।

चंद्रमा पर भेजेंगे रोवर यान

पिछले महीने ऑस्ट्रेलियन स्पेस एजेंसी ने अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के साथ एक करार पर दस्तखत किया था। उसके तहत ये दोनों एजेंसियां साझा तौर पर एक घुमंतू (रोवर) यान चंद्रमा पर भेजेंगी। ये यान वहां के पत्थरों को इकट्टा करेगा और उनसे ऑक्सीजन निकालने की कोशिश करेगा। जॉन ग्रांट ने ये लेख इसी करार के बाद लिखा है। इसमें इस बात की जानकारी दी गई है कि दोनों देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों ने जो समझौता किया, उसके पीछे समझ क्या है।

विज्ञापन


ग्रांट ने इस बात का भी जिक्र किया है कि अब ऐसे प्रायोगिक रिएक्टर तैयार किए जा रहे हैं, जिनसे ऑक्सीजन का उत्पादन बेहतर ढंग से हो सकेगा। इनमें ऑक्सीजन का उत्पादन इलेक्ट्रॉलाइसिस विधि से होगा। इस बारे में पहल बेल्जियम की एक कंपनी ने की है। ग्रांट के मुताबिक यह संभव है कि नई टेक्नोलॉजी को चंद्रमा पर भेजा जाए। ऐसा 2025 तक किया जा सकता है। यूरोपियन स्पेस एजेंसी संभवतया इसे भेजेगी। इस एजेंसी का मकसद भी चंद्रमा पर मौजूद संसाधनों का इस्तेमाल करने की कोशिश है।

ग्रांट ने कहा है कि चंद्रमा पर मौजूद ऑक्सीजन के इस्तेमाल को लेकर अभी जो संभावनाएं दिख रही हैं, वे उत्साह बढ़ाने वाली हैं। लेकिन ऐसा करते समय यह भी ध्यान में रखना होगा कि धरती के इस उपग्रह के वातावरण इससे नुकसान न पहुंचे।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें