चंद्रमा की सतह पर यानी उसके ऊपरी वातावरण में इतनी ऑक्सीजन नहीं है, जितना मनुष्य के जीवित रहने के लिए जरूरी होती है। लेकिन चंद्रमा की पथरीली सतह के अंदर भरपूर ऑक्सीजन है। ये मात्रा इतनी ज्यादा है कि उससे आठ अरब मनुष्यों की एक लाख साल तक की सांस लेने की जरूरत पूरी हो सकती है। ये बात ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक जॉन ग्रांट ने बताई है। इसी हफ्ते कन्वर्सेशन नाम की पत्रिका में लिखे एक लेख में उन्होंने इस बारे में विस्तार जानकारी जानकारी दी।
ग्रांट ने अनुमान लगाया है कि एक मनुष्य को जीवित रहने के लिए रोज 800 ग्राम ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है। उधर चंद्रमा की पथरीली सतह 10 मीटर गहरी है। इस सतह में 45 फीसदी हिस्सा ऑक्सीजन का है। ऑक्सीजन की समृद्ध मात्रा की वजह से ही इस सतह से सिलिका, एल्यूमिनियम, लौह और मैग्नेशियम ऑक्साइड जैसे खनिज मजबूती से चिपके रहते हैं।
ग्रांट के मुताबिक पथरीली सतह का ऊपरी हिस्सा ऐसा नहीं है, जहां सांस लेने लायक स्थिति हो। लेकिन सतह के अंदर छिपी ऑक्सीजन को निकाला जा सकता है। ऐसा करने की प्रक्रिया आसान है। लेकिन इसमें मुश्किल यह है कि इस प्रक्रिया में काफी मात्रा में ऊर्जा की खपत होती है। इसलिए ये काम आसानी से तभी हो सकता है, जब चंद्रमा पर ही सौर ऊर्जा या वहां मौजूद ऊर्जा के दूसरे स्रोतों का इस्तेमाल करना संभव हो।
पिछले महीने ऑस्ट्रेलियन स्पेस एजेंसी ने अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के साथ एक करार पर दस्तखत किया था। उसके तहत ये दोनों एजेंसियां साझा तौर पर एक घुमंतू (रोवर) यान चंद्रमा पर भेजेंगी। ये यान वहां के पत्थरों को इकट्टा करेगा और उनसे ऑक्सीजन निकालने की कोशिश करेगा। जॉन ग्रांट ने ये लेख इसी करार के बाद लिखा है। इसमें इस बात की जानकारी दी गई है कि दोनों देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों ने जो समझौता किया, उसके पीछे समझ क्या है।