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एक्सप्लेनर: पाकिस्तान को छोड़ अब इस्राइल से मदद क्यों मांग रहा सऊदी, हूतियों के खिलाफ कितना हो सकता है फायदा?

Tue, 22 Sep 2026 05:27 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

Saudi Arabia vs Houthi: हूतियों के हमलों के बीच सऊदी अरब ने इस्राइल से खुफिया मदद क्यों मांगी? जानिए अमेरिका, पाकिस्तान और तुर्किये के पीछे हटने की असली वजह और इसके रणनीतिक मायने।
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सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों का हमला। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सऊदी अरब और यमन के हूतियों के बीच संघर्ष अब इस कदर बढ़ चुका है कि इसकी आंच इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र धर्मस्थल मक्का तक पहुंचती दिख रही है। दरअसल, बीते एक हफ्ते के अंदर हूती विद्रोही संगठन ने सऊदी अरब पर हमले तेज किए हैं और लाल सागर में व्यापार के अहम बंदरगाहों-मार्गों पर अपनी निगरानी मजबूत कर ली है। इतना ही नहीं, सऊदी का दावा है कि उसने बीते मंगलवार को मक्का की तरफ आ रहे दो प्रोजेक्टाइल को मार गिराया। हूती संगठन इससे इनकार जरूर कर रहा है, लेकिन सऊदी का दावा है कि यह हमले हूतियों की ओर से ही किए गए थे। 
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जिस तरह सऊदी मौजूदा समय में हूतियों के खिलाफ बचाव की मुद्रा में आया है, उससे माना जा रहा है कि एक संगठन फिलहाल पूरे देश पर भारी पड़ रहा है। इस बीच अब खबर है कि सऊदी ने अपने सहयोगियों के मुंह मोड़ने के बाद हूतियों के खिलाफ मदद के लिए कभी अपने कट्टर दुश्मन रहे इस्राइल का साथ मांगा है। यह तब हुआ है जब सऊदी को उसके पारंपरिक करीबी अमेरिका ने मदद से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं रक्षा उत्पादन में अग्रणी तुर्किये और खुद के परमाणु शक्ति होने की शेखी बघारने वाले पाकिस्तान ने भी 'मक्का रक्षा समझौते' के बावजूद उसे मदद नहीं भेजी। 

हूती विद्रोही। - फोटो : अमर उजाला
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर सऊदी अरब और हूतियों की जंग में हालिया समय में क्या हुआ है? कैसे सऊदी अरब का अमेरिका से करीबी रिश्ता और पाकिस्तान-तुर्किये के साथ हुआ 'मक्का समझौता' भी उसके बचाव का जरिया नहीं बन सका है? अब इस्राइल के साथ सऊदी के संपर्क को लेकर क्या सामने आ रहा है? कैसे हूती विद्रोही सऊदी अरब और इस्राइल दोनों के दुश्मन बने रहे हैं और इनके खिलाफ अभियान में क्यों इनके एक साथ आने की चर्चाएं उठी हैं? आइये जानते हैं...
 

सऊदी अरब और हूतियों की जंग में हालिया समय में क्या हुआ है?

1. सऊदी अरब पर हूतियों के हमले और हवाई अलर्ट
  • हूतियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद और लाल सागर तट पर स्थित यानबू में अरामको के तेल और ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं। 
  • सऊदी का दावा है कि मक्का पर भी प्रोजेक्टाइल दागे गए, जिन्हें मार गिराया गया। इसके अलावा रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हमले में ईंधन टैंकों में आग लग गई, जिससे उड़ानों में बाधा आई।
  • हूतियों ने मक्का क्षेत्र, जेद्दा, ताइफ, अबहा और बिश की ओर भी ड्रोन और मिसाइलें दागी हैं। इसके अलावा सऊदी अरब की पेट्रोलाइन (ईस्ट-वेस्ट) तेल पाइपलाइन पर हमले के कारण इसका संचालन प्रभावित हुआ है।

सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों का हमला। - फोटो : अमर उजाला
2. यमन में हूतियों की जमीनी बढ़त और समुद्री नाकेबंदी
  • हूतियों ने यमन के पूरे पश्चिमी लाल सागर तट पर तेज बढ़त बनाते हुए रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में स्थित पेरिम द्वीप पर नियंत्रण हासिल कर लिया।
  • दुनिया की तेल आवाजाही के लिए अहम इस जलमार्ग पर कब्जा करने के बाद हूतियों ने खास तौर पर सऊदी अरब के जहाजों और तेल टैंकरों पर नाकाबंदी की घोषणा की है।
  • हूती बल ताइज और लहिज प्रांतों की कहबूब पहाड़ियों और अल-वाजिया जैसे रणनीतिक पहाड़ी इलाकों पर कब्जा करने के लिए यमनी सरकारी बलों से युद्ध लड़ रहे हैं।

3. सऊदी गठबंधन की कार्रवाई और मानवीय प्रभाव
  • सऊदी के नेतृत्व वाले अरब देशों के गठबंधन ने यमन में हूती ठिकानों पर सैकड़ों हवाई हमले किए हैं। हूतियों का दावा है कि उन्होंने एक सऊदी लड़ाकू विमान को मार गिराया।
  • इस ताजा हिंसा की वजह से यमन में सैकड़ों लोगों की जान गई है और 1,00,000 से ज्यादा लोग अपने घरों को छोड़कर भागने को मजबूर हुए हैं।

सऊदी बनाम हूती विद्रोही। - फोटो : अमर उजाला

अमेरिका का करीबी सहयोगी सऊदी, फिर क्यों नहीं मिल रही मदद?

हूतियों के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत में ही जब सऊदी अरब को नुकसान हुआ तो उसके क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका से मदद मांगी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सलमान की तरफ से अमेरिका से अपील की गई थी कि वह हूतियों पर हवाई हमले करे और मामले में सैन्य स्तर पर दखल दे। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इशारे पर अमेरिका अब तक इस संघर्ष का हिस्सा नहीं बना है। इसकी कुछ वजहें भी हैं...

हूतियों के साथ पहले ही वार्ता में जुटा है अमेरिका
अमेरिका ने ओमान के जरिए हूती विद्रोहियों के साथ लगातार संपर्क साध रखा है। हूतियों ने अमेरीका को आश्वासन दिया है कि अगर अमेरिका उन पर सीधे सैन्य हमले नहीं करता, तो वे लाल सागर में अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी कहा कि हूती अमेरिका से नहीं लड़ना चाहते और उनके जहाजों को जाने दे रहे हैं।

ये भी पढ़ें: मक्का समझौते पर सवाल: हूती लड़ाकों की पाकिस्तान-तुर्किये को धमकी- सऊदी अरब का साथ दिया तो अंजाम भुगतना होगा

ईरान के साथ मुख्य युद्ध और नए मोर्चे से बचाव
अमेरिका पहले से ही पश्चिम एशिया में ईरान के साथ संघर्ष में उलझा हुआ है। वॉशिंगटन यमन में एक और सैन्य मोर्चे में घिसटने से बचना चाहता है। यहां तक कि अमेरिकी सेना की ओर से हूतियों पर हवाई हमले की पूरी तैयारी कर लिए जाने के बाद भी राष्ट्रपति ट्रंप ने अंतिम समय में हमलों को रद्द कर दिया।

अमेरिका की अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताएं
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, वॉशिंगटन का ध्यान सिर्फ अपने मुख्य राष्ट्रीय सुरक्षा हितों, जैसे- अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों में नेविगेशन की स्वतंत्रता की रक्षा करने पर है, जबकि क्षेत्रीय सुरक्षा संकटों से निपटने की प्राथमिक जिम्मेदारी वह अपने क्षेत्रीय साझेदारों पर ही छोड़ रहा है।

सिर्फ खुफिया सहायता तक सीमित हुआ समर्थन
अमेरिका ने सीधे हवाई हमले करने या सैनिक भेजने से इनकार करते हुए सऊदी अरब को सिर्फ अमेरिकी सेंट्रल कमान (सेंटकॉम) के जरिए खुफिया जानकारी और हूती ठिकानों को निशाना बनाने से जुड़ी सहायता देने तक ही खुद को सीमित रखा है।

मक्का समझौते के बावजूद पाकिस्तान-तुर्किये क्यों नहीं कर रहे सऊदी की मदद

हूतियों की धमकियों से डोला हौसला
  • अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इसके बावजूद, हूती-सऊदी संघर्ष में पाकिस्तान और तुर्किये की ओर से प्रत्यक्ष सैन्य सहायता नहीं पहुंचाई गई है। 
  • हूती समूह के अधिकारी मोहम्मद अल-बुखैती ने स्पष्ट किया है कि अगर पाकिस्तान या तुर्किये अपनी सेना या सैन्य उपकरण सऊदी अरब के समर्थन में यमन के संघर्ष क्षेत्र में तैनात करते हैं, तो उन्हें सख्त जवाब मिलेगा। हूतियों चेतावनी दी है कि दोनों देश युद्ध में सऊदी गठबंधन के प्रतिनिधि न बनें और तटस्थ रहें।

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सऊदी की मदद न करने पर तुर्किये-पाकिस्तान के तर्क। - फोटो : अमर उजाला
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सऊदी की मदद न करने पर तुर्किये-पाकिस्तान के तर्क। - फोटो : अमर उजाला
ईरान के साथ रिश्तों की भी चिंता
पाकिस्तान और तुर्किये दोनों के ईरान के साथ आर्थिक, ऊर्जा और कूटनीतिक संबंध हैं। तेहरान-समर्थित हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरने से उनका संतुलित रुख प्रभावित हो सकता है। इस के चलते पाकिस्तान प्रत्यक्ष सैन्य तैनाती के बजाय क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत का रास्ता अपना रहा है।

घरेलू राजनीति की भी मजबूरी
पाकिस्तान और तुर्किये की जनता में यमन के नागरिकों की मानवीय स्थिति के प्रति सहानुभूति जताई है। इसके अलावा, पाकिस्तान के लिए किसी भी विवादित क्षेत्रीय सैन्य अभियान से दूर रहना घरेलू राजनीतिक नजरिये से भी जरूरी माना जा रहा है।

अब इस्राइल के साथ सऊदी के संपर्क को लेकर क्या सामने आ रहा है?

  • राजनयिक और सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड के जरिए से इस्राइल और सऊदी अरब के बीच खुफिया जानकारी साझा करने की वार्ता हुई है। सेंटकॉम के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने जेद्दा में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात कर इस समन्वय पर चर्चा की थी।
  • सेंटकॉम प्रमुख की मेजबानी में हाल ही में जर्मनी में एक उच्चस्तरीय बैठक की गई थी। इसमें इस्राइल और सऊदी अरब के सैन्य प्रमुखों के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, कुवैत, कतर, जॉर्डन और मिस्र के शीर्ष सैन्य अधिकारी शामिल हुए थे, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और वायु रक्षा समन्वय पर चर्चा हुई।
  • इस्राइल की तरफ से सऊदी अरब को लाल सागर और बाब अल-मंदेब क्षेत्र में हूतियों की सैन्य तैनाती, उनके संभावित हमलों और मिसाइल व ड्रोन खतरों से जुड़ी खुफिया जानकारी भी देने से जुड़े खुलासे हुए हैं।

. - फोटो : अमर उजाला

एक यहूदी देश से मदद मांगने पर क्यों मजबूर हुआ सऊदी?

चूंकि अमेरिका की तरफ से सीधे युद्ध में उतरने से इनकार किया जा चुका है, इसलिए सऊदी को खुफिया मदद के लिए इस्राइल का रुख करना पड़ा है। दरअसल, ईरान से सीधा टकराव होने की वजह से लेबनान के हिज्बुल्ला और यमन के हूती विद्रोही भी इस्राइल के लिए खतरा बने रहे हैं। यह दोनों शिया संगठन ईरान के खुले समर्थक हैं और हूतियों को तो ईरान की तरफ से सऊदी के खिलाफ युद्ध में हथियारों की और आर्थिक मदद मिलती रही है। ऐसे में सऊदी अरब ने हूतियों से इस्राइल की दुश्मनी को ध्यान में रखते हुए उससे संपर्क स्थापित किया है। 

इतना ही नहीं, इस्राइल के पास लाल सागर और समुद्री अभियानों पर उच्चस्तरीय खुफिया और निगरानी क्षमताएं हैं, जो सऊदी अरब के अन्य क्षेत्रीय या संधि से जुड़े सहयोगी देशों के पास मौजूद नहीं हैं। लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य जैसे जटिल समुद्री इलाके में तुर्किये या पाकिस्तान के पास भी वैसी विशिष्ट खुफिया, निगरानी और टार्गेटिंग क्षमताएं नहीं हैं, जैसी इस्राइल के पास हैं। सऊदी अरब को इस संकट में तात्कालिक रूप से खुफिया मदद की जरूरत है, जिसे इस्राइल बेहतर मुहैया करा सकता है। 
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इस्राइल के अखबार मारीव की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी हूतियों के बढ़ते हमलों के बीच अब इस्राइल से मदद का दायरा बढ़ाना चाहता है। वह इस्राइल से एआई और रक्षात्मक उपकरण खरीदने की तैयारी कर रहा है। अगर ऐसा होता है तो यह दो पुराने दुश्मन देशों के बीच सहयोग का एक बड़ा घटनाक्रम होगा। 


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