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Indo-China: चीन के मामले में कूटनीति की इतनी बड़ी गुगली क्यों फेंक गए विदेश मंत्री एस जयशंकर?

सार

विदेश मंत्री एस जयशंकर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच में अनौपचारिक बैठक कराने में मुख्य किरदार निभाने वाला माना जाता है। जयशंकर चीन में भारत के राजनयिक रह चुके हैं। इधर रूस में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की मुलाकात अपने चीनी समकक्ष और विदेश मंत्री वांग यी से भी हुई है।
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एस. जयशंकर - फोटो : X/ Jaishankar
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विस्तार
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जिनेवा के सेंटर फॉर सिक्योरिटी पॉलिसी में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन के साथ गतिरोध पर कूटनीति की बड़ी गुगली फेंकी। जून 2020 में गलवां घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच में हुई झड़प के बाद से कूटनीति के मास्टर एस जयशंकर अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मंच से चीन को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। यह पहली बार है, जब जयशंकर ने कहा है कि लद्दाख क्षेत्र में दोनों देशों के सैनिकों को पीछे ले जाने (डिसइंगेजमेंट) को लेकर 75 प्रतिशत तक की गलतफहमी को दूर कर लिया गया है।
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हालांकि, चार साल के प्रयास के बाद अभी भी चीन डेपसांग और डेमचोक से सैनिकों को पीछे ले जाने पर कोई बातचीत नहीं हुई है। दोनों देशों के सीमा के इस पार और उस पार करीब 50-60 हजार सैनिक तैनात हैं। भारत ने टैंक, तोप, यूएवी, हेलीकॉप्टर, फाइटर जेट समेत फ्रंट लाइन के बेड़े को तैनात कर रखा है। इसके बारे में भारतीय विदेश और रक्षा मंत्रालय के अधिकारी कहते हैं कि जब तक चीन के सैनिक पीछे (अप्रैल 2020 की स्थिति) नहीं जाते, भारत सैनिकों को पीछे ले जाने का जोखिम नहीं उठा सकता। साफ है कि अविश्वास में कुछ तो कमी आई है। 

विदेश मंत्री जयशंकर ने भी पिछले दिनों तक अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत और चीन के रिश्ते को असमान्य बताया। चीन पर द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय समझौते, सहमति को तोड़ने का आरोप तक लगाया। उन्होंने लगातार कहा है कि जब तक चीन के सैनिक पुराने तैनाती वाले स्थान पर नहीं चले जाते, तब तक हालात में सुधार की गुंजाइश कम है।
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किसी बड़ी रोडमैप की तैयारी में तो नहीं हैं विदेश मंत्री?
विदेश मंत्री एस जयशंकर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच में अनौपचारिक बैठक कराने में मुख्य किरदार निभाने वाला माना जाता है। जयशंकर चीन में भारत के राजनयिक रह चुके हैं। इधर रूस में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की मुलाकात अपने चीनी समकक्ष और विदेश मंत्री वांग यी से भी हुई है। एनएसए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मिले हैं। पुतिन इस समय क्षेत्रीय गठजोड़ पर काफी अधिक ध्यान दे रहे हैं। पुतिन चाहते हैं कि भारत-चीन और रूस के बीच में बना त्रिपक्षीय फोरम आरआईसी फिर से अपने मजबूत आधार को पाए। द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और त्रिपक्षीय तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्दे इसमें चर्चा में आएं और समाधान का रास्ता निकाला जाए। 

इसी आरआईसी फोरम में 2006 में ब्राजील और फिर 2010 में साउथ अफ्रीका के शामिल होने के बाद यह ब्रिक्स के स्वरूप तक विस्तारित हुआ है। जयशंकर ने ब्रिक्स को लेकर भी दुनिया को ताना मारा है। उन्होंने पश्चिम के देशों को खरी-खरी सुनाते हुए कहा कि आप जी7 के क्लब में जाने नहीं देते तो हमने खुद का क्लब (ब्रिक्स) बनाया। जयशंकर यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि जब ब्रिक्स की बारी आती है तो आपका जवाब कितना असुरक्षित हो जाता है। जब जी-20, जी-7 है तो ब्रिक्स क्यों नहीं हो सकता? जयशंकर ने यह बयान ऐसे ही नहीं दिया है। दरअसल एक बार फिर भारतीय कूटनीति के रणनीतिकार बदली भू-राजनीतिक परिस्थितियों में एक बड़ी कूटनीतिक तैयारी में हैं।

कहीं नया अध्याय मजबूरी तो नहीं....
ब्रिक्स के शिखर नेताओं की बैठक होने वाली है। पिछले साल इसमें ब्रिक्स के शिखर नेताओं ने वर्चुअली इसमें हिस्सा लिया था। इस बार सभी शिखर नेता बैठक में शरीक होने वाले हैं। 2024 में ईरान, सऊदी अरब, मिश्र, यूएई और इथोपिया भी इसके सदस्य बनाए गए हैं। इस बार 22 अक्टूबर को रूस के कजान शहर में ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन होना है। इस शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने पहले ही मिलने की इच्छा जता दी है। एनएसए डोभाल इस संदेश को लेकर भारत आए हैं। तैयारी यह है कि इसी शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच में मुलाकात हो। रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाया जाए। माना जा रहा है कि इसमें रूस का भी काफी योगदान है। 

हालांकि, विदेश मंत्रालय के अधिकारी इस बारे में अभी खुलकर नहीं बोल रहे हैं, लेकिन माना जा रहा है कि मोदी और जिनपिंग की भेंट से पहले इसके लिए वातावरण तैयार करना भी बड़ी प्राथमिकता है। इसके लिए चीन और भारत के रणनीतिकारों ने तैयारी शुरू कर दी है। भारत के प्रधानमंत्री की वैसे भी यह कूटनीतिक लाइन है कि हर समस्या का समाधान संवाद के माध्यम से संभव है। भारत बुद्ध का देश है और इस पर अमल करता है। यह बदली हुई अंतरराष्ट्रीय भू-राजनैतिक परिस्थिति की जरूरत है कि इसके अनुसार वातावरण तैयार किए जाएं।

आयात और निर्यात लॉबी का भी है बड़ा दबाव
भारत और चीन में आयात और निर्यात की लॉबी है। उसका भी अपने-अपने देशों के नीति निर्माताओं पर भारी दबाव है। भारत के कुछ प्रमुख उद्योगपति चीन के साथ बेहतर रिश्ते और तमाम वस्तुओं पर आयात शुल्क को व्यावहारिक बनाए जाने के पक्षधर हैं। पिछले कुछ महीनों में भारत ने भी इसमें कुछ ढील दी है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल भी चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्ते में कुछ पहल की मंशा रखते हैं। हालांकि, वाणिज्य मंत्रालय और डीआईआईपी के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों का कहना है कि अभी रास्ते थोड़ा कठिन हैं। निकट समय में चीन के साथ उदार रिश्ते की संभावना थोड़ा दूर दिखाई दे रही है। एक लॉबी ऐसी भी है जो चीन के सस्ते सामान से बाजार के पटने और थाईलैंड, इंडोनेशिया जैसे हालात होने की भी चेतावनी दे रही है। वहीं उत्पादन क्षेत्र के दिग्गजों का कहना है कि चीन से कच्चा माल आने में समस्या के कारण भारत को दूसरे वस्तुओं के निर्यात में समस्या झेलनी पड़ रही है।

आंकड़ों की बात
- आंकड़ों पर जाएं तो 2015-2022 तक भारत और चीन के बीच में द्विपक्षीय व्यापार में 12.87 प्रतिशत वार्षिक की दर से 90.14 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। 
- 2022 में चीन के साथ कुल व्यापार में 8.47 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई। यह 136.26 अरब अमेरिकी डॉलर के करीब है। 
- 2023-24 के दौरान चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार देश रहा। पिछले साल दोनों देशों के बीच में 118.4 अरब डॉलर का कारोबार हुआ, जबकि दूसरे नंबर पर अमेरिका है। 
- अमेरिका के साथ भारत का 2023-24 में 118.3 अरब डालर का कारोबार हुआ है। हालांकि, इसके सामानांतर एक तस्वीर है। भारत ने 2023-34 के दौरान चीन को 16.66 अरब डॉलर (अमेरिकी) का निर्यात किया था, जबकि आयात 101.75 अरब डॉलर का हुआ। अमेरिका को यही निर्यात 77.5 अरब डॉलर का रहा और आयात 40.1 डॉलर का हुआ। इस तरह चीन से भारत का व्यापार घाटा 85 अरब डॉलर का है।  

बफर जोन के जरिए भारत ने क्या सुलझाया?
भारत-चीन के बीच में सैन्य विसैन्यीकरण में सबसे बड़ा मसला डेपसांग और डेमचोक का फंसा हुआ है। चीन यहां से अपनी सेनाओं को अप्रैल 2020 वाली स्थिति में नहीं ले जाना चाहता। चीन के रणनीतिकार दौलत बेग ओल्डी के पास से गुजर रहे अपने हाईवे की सुरक्षा को भी इसके लिए जरूरी मान ले रहे हैं। जबकि भारत की कोशिश यहां से सैन्य विसैन्यीकरण सुनिश्चित कराने की है। यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। दरअसल, गलवां घाटी में हुई झड़प के बाद भारत ने चीन के साथ सैन्य विसैन्यीकरण के उद्देश्य को हल करने के लिए बफर जोन का उपाय पर सहमति बनाई। इसके अंतरर्गत वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत की जमीन पर बफर जोन बनाए जाने की सहमति बनी। चीन के सैनिक बफर जोन के उसपार चले गए और हमारे इस पार। यह सहमति गलवां वैली के अलावा सितंबर 2022 में गोगरा हॉटस्प्रिंग के पेट्रोलिंग प्वाइंट 15 पर भी बनी। इसी आधार पर दोनों देशों के सैनिक पीछे हटे। पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारे के पेट्रोलिंग प्वाइंट को इसी बफर जोन के माध्यम से सुलझाया गया।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी मारते हैं सरकार पर ताना
भारत की चीन के साथ बफर जोन पर सहमति, डेपसांग और डेमचोक में चीन की सेनाओं के भारतीय कब्जे वाले क्षेत्र में डटे होने को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी अक्सर सरकार को घेरते रहते हैं। हाल में फिर उन्होंने बयान दिया कि भारत की राजधानी दिल्ली के क्षेत्रफल से अधिक की हमारी जमीन पर चीन ने कब्जा कर रखा है। दरअसल 2013 में चीन की सेनाओं ने इसी तरह की हिमाकत की थी। वह डेपसांग और डेमचोक में घुस आई थी। लंबे समय तक रुकी भी थी, लेकिन तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और भारतीय रणनीतिकारों की पहल पर बाद में वापस लौट गई थी। इस बार 2020 में आकर डट गई। ऐसा नहीं है कि इस बार भारत ने कोशिश नहीं की। डेपसांग, डेमचोक, पैंगोंग त्सो झील के पास से चीन के सैनिकों को पीछे भेजने के लिए ही भारत ने कैलाश रेंज की पहाड़ियों से अपने सैनिकों को पीछे बुलाया था, लेकिन चीन ने बदले में केवल हेकड़ी दिखाई है।
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