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यूक्रेट-रूस युद्ध: संकट की वजह से चार मोर्चों की पूरी सूरत ही बदल गई, जानिए इस बारे में विश्लेषकों की राय

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, वॉशिंगटन Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Sun, 06 Mar 2022 11:14 PM IST

सार

विश्लेषक जोशुआ बर्गिनगर का कहना है कि यूक्रेन पर रूसी हमले ने सूरत बदल दी है। अब पश्चिमी देशों ने रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन को उस हद तक अलग-थलग कर दिया है, जैसा पहले कभी नहीं हुआ।
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व्लादिमीर पुतिन - फोटो : पीटीआई


टीवी चैनल सीएनएन की वेबसाइट पर विश्लेषक जोशुआ बर्गिनगर ने एक टिप्पणी में लिखा है कि यूक्रेन पर रूसी हमला 9/11 (11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमलों) के बाद दुनिया की भू-राजनीतिक व्यवस्था में आए बदलाव की सबसे हिंसक अभिव्यक्ति है। 9/11 के बाद वर्षों तक पश्चिमी नेताओं का ध्यान अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे दुश्मनों से निपटने में खपा रहा। 


उस दौर में क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति कार्यालय) को वैसे खतरे के रूप में नहीं देखा गया, जैसा उसे अतीत में (सोवियत जमाने में) समझा जाता था। हालात ऐसे हो गए कि 2012 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में बराक ओबामा ने अपने प्रतिद्वंद्वी मिट रोमनी का यह कहने के लिए मजाक उड़ाया कि रूस अभी भी अमेरिका का नंबर एक भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। बर्गिनगर ने कहा है कि यूक्रेन पर रूसी हमले ने सूरत बदल दी है। अब पश्चिमी देशों ने रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन को उस हद तक अलग-थलग कर दिया है, जैसा पहले कभी नहीं हुआ।


विशेषज्ञों के मुताबिक, दूसरा बड़ा बदलाव यह है कि यूरोप अब अमेरिका के साथ अधिक एकजुट हो गया है। इसे अमेरिकी की उपलब्धि बताया गया है। इन विशेषज्ञों के मुताबिक, अब तक यूरोपियन यूनियन के देशों में विदेश नीति को लेकर मतभेद रहते थे। ये देश अपनी विदेश का नियंत्रण ईयू के हाथ मे नहीं देना चाहते थे। लेकिन यूक्रेन पर हमले के बाद स्थिति बदल गई है। अब पूरा यूरोप सामूहिक रक्षा, सुरक्षा और विदेश नीति विकसित करने पर अधिक एकमत हो गया है। यूरोपीय देशों ने अब यह भी स्वीकार कर लिया है कि अगर उन्हें अपनी सुरक्षा का इंतजाम करना है, तो उस पर खर्च करना होगा। ये जिम्मा वे अमेरिका पर नहीं छोड़ सकते।


एक तीसरा बदलाव शरणार्थी समस्या के स्वरूप में हुआ है। यूरोपीय देशों को अब तक गरीब देशों से आने वाले शरणार्थियों की समस्या से जूझना पड़ता था। लेकिन यूक्रेन युद्ध शुरू होने के दस दिन के अंदर वहां से लगभग दस लाख लोग विस्थापित होकर यूरोपीय देशों की तरफ चल पड़े। संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी उच्चायुक्त फिलिपो ग्रांडी ने कहा है कि मैंने लगभग 40 वर्ष तक शरणार्थी समस्या पर काम किया है, लेकिन शायद ही मैंने पहले कभी इतनी तेजी से ऐसी समस्या खड़ी होते देखी हो।


इसके अलावा चौथा बदलाव आर्थिक मोर्चे पर है। यूक्रेन संकट की वजह से यूरोप  से अमेरिका तक प्राकृतिक गैस की कीमत तेजी से उछली है। इससे पहले से ही ऊंची महंगाई दर से जूझ रहे देशों के सामने नई चुनौती आ खड़ी हुई है। रेटिंग एजेंसी मूडीज ने चेतावनी दी है कि वैश्विक सप्लाई चेन में रुकावट और कोविड-19 महामारी से पहले से ही प्रभावित विश्व अर्थव्यवस्था अब अफरातफरी का शिकार हो सकती है। दूसरे विश्लेषकों ने भी कहा है कि यूक्रेन संकट की आर्थिक कीमत सारी दुनिया को चुकानी होगी और हर जगह लोगों की मुसीबत इस वजह से बढ़ेगी।

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