रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन
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यूक्रेन मामले में पश्चिमी देशों ने रूस के खिलाफ जो वित्तीय युद्ध छेड़ा, रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन उसका जवाब अब जवाबी वित्तीय हमलों के जरिए दे रहे हैं। इस सिलसिले में उन्होंने यूरोप के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। गुरुवार को उन्होंने उस आदेश पर दस्तखत कर दिए, जिसके तहत रूस अब ‘अमित्र देशों’ को प्राकृतिक गैस की बिक्री उन देशों के रुबल में भुगतान के लिए तैयार होने पर ही करेगा। यह आदेश शुक्रवार से लागू हो गया है।
जर्मनी ने मांगी मोहलत
रूसी मीडिया की खबरों के मुताबिक रूस के इस फैसले से जर्मनी को कुछ दिन के लिए राहत मिलेगी। जर्मनी के चांसलर ओलफ शोल्ज ने बुधवार को पुतिन से फोन पर बात की थी। बताया गया है कि उस दौरान पुतिन रूसी मुद्रा रुबल में भुगतान की तैयारी के लिए जर्मनी को कुछ वक्त देने पर राजी हो गए। लेकिन उसे कितना समय दिया गया है, इस बारे में जानकारी नहीं मिली है। रूस ने ‘अमित्र देशों’ की सूची में उन देशों को रखा है, जिन्होंने उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें अमेरिका, यूरोपियन यूनियन (ईयू), ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर आदि शामिल हैं।
जी-7 और ईयू ने रुबल में भुगतान से फिलहाल इनकार किया है। लेकिन रूसी विश्लेषकों का कहना है कि अगर रूस ने उन देशों को गैस की सप्लाई रोक दी, तो उन्हें हार कर रुबल में भुगतान की बात माननी पड़ेगी। ईयू क्षेत्र की रोजमर्रा की गैस की जरूरत की लगभग 40 फीसदी पूर्ति रूसी निर्यात से होती है।
मशहूर ब्रिटिश पत्रिका इकॉनमिस्ट के एक पॉडकास्ट में बताया गया है कि पश्चिमी प्रतिबंधों का रूस पर उतना असर नहीं दिखा है, जितनी उम्मीद अमेरिका और उसके साथी देशों को थी। इसके विपरीत रूस की वास्तविक और वित्तीय अर्थव्यवस्थाओं ने प्रतिबंध को सह लेने की आश्चर्यजनक क्षमता दिखाई है। वेबसाइट एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 2014 में यूक्रेनी इलाके क्राइमिया को जब रूस ने खुद में मिला लिया, तब भी पश्चिमी देशों ने उस पर पाबंदियां लगाई थीं। तब से रूस ने प्रतिबंधों का मुकाबला करने की बड़ी तैयारी की। उसका फायदा अब उसे मिला है।
खत्म होगा डॉलर का तिलिस्म!
दूसरी तरफ ताजा प्रतिबंधों की उलटी मार पश्चिमी देशों पर भी पड़ रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से जुड़ी रहीं अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा है कि रूस और चीन जिस तरह बिना डॉलर का इस्तेमाल किए कारोबार का सिस्टम आगे बढ़ा रहे हैं, उससे विश्व व्यापार पर डॉलर का वर्चस्व टूट सकता है। गोपीनाथ ने कहा कि हालांकि डॉलर आगे भी एक प्रमुख मुद्रा बना रहेगा, लेकिन दुनिया में कारोबार के दो या उससे अधिक समानांतर सिस्टम चलने की संभावना पैदा हो गई है।
वेबसाइट एशिया टाइम्स के एक विश्लेषण में कहा गया है कि रूस पश्चिमी प्रतिबंधों का बेहतर ढंग से मुकाबला इसलिए कर सका है, क्योंकि चीन उसका एक बड़ा मददगार बन कर सामने आया है। इस विश्लेषण के मुताबिक चीन की दिलचस्पी भी डॉलर का वर्चस्व खत्म करने में है। इसलिए अब इन दोनों देशों ने मिल कर डॉलर पर निर्भरता घटाने की मुहिम आगे बढ़ा दी है। इसमें उन तमाम देशों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है, जिन्हें आशंका है कि आगे चल कर अमेरिका कभी उन पर भी प्रतिबंध लगा सकता है और अपने यहां जमा उनकी संपत्तियों को जब्त कर सकता है।