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रूस-यूक्रेन जंग: छद्म योद्धाओं के सक्रिय होने से पहले बड़ी सैन्य कार्रवाई तय, पुतिन कर रहे तैयारी

सार

  •  इराक, सीरिया के तमाम योद्धा कर रहे हैं यूक्रेन का रूख
  •  रूस का आरोप, अमेरिका के मानव रहित विमान कर रहे हैं यूक्रेन की सहायता
  •  यूक्रेन की नई मांग को अमेरिका ने ठुकराया, कहा रूस के खिलाफ सीधे युद्ध में नहीं उतरना
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युद्ध के दौरान जवान। - फोटो : PTI
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विस्तार
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क्या अमेरिका और उसके दबदबे वाला नाटो यूक्रेन संकट की आग में घी डाल रहा है? रूस का तो यही कहना है कि हां, नाटो ऐसा कर रहा है। रूस ने अमेरिका पर अब मानव रहित विमानों के जरिए यूक्रेन की मदद करने का लगाया है। रूस का कहना है कि काला सागर में उसके एक पोत पर यूक्रेन के सैनिकों ने हमला अमेरिका के यूएवी से मिले निर्देश के आधार पर किया है। दूसरी तरफ रूस को आशंका है कि सीरिया, इराक में सक्रिय तमाम आतंकी संगठन या लड़ाके अमेरिका और नाटो के इशारे पर यूक्रेन की मदद के लिए आ सकते हैं। क्रेमलिन इस तरह की आशंका पर गंभीरता से विचार कर रहा है। वह यथाशीघ्र कीव पर काबू पा लेना चाहता है।

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सामरिक रणनीति के जानकार सूत्र का कहना है कि राजधानी कीव को काबू में करने के लिए रूस का 40 मील का सैन्य काफिला वहां पहुंच रहा है। इसे यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लोदिमीर जेलेंस्की पर दबाव बढ़ाने की नीति मानी जा सकती है। बताते हैं कि राष्ट्रपति जेलेंस्की ने अमेरिका से नो फ्लाई जोन घोषित करने की मांग की थी, लेकिन फिलहाल अमेरिका ने इस मांग को ठुकरा दिया है। इसके पीछे अमेरिका ने तर्क दिया है कि वह रूस के साथ सैन्य मोर्चा खोलने के पक्ष में नहीं है। बताते हैं कि यूक्रेन के कुछ पड़ोसी देशों की भी चिंताएं बढ़ रही हैं। इसके पूरे संकेत हैं कि सीरिया के विद्रोही गुट, इराक की सीमा में सक्रिय कुछ लड़ाके आदि भी यूक्रेन का रुख कर सकते हैं। 

यूक्रेन की सरकार में माफिया सक्रिय : शशांक


पूर्व विदेश सचिव शशांक भी कहते हैं कि दुनिया में इस तरह के कई माफिया हैं। इनका उपयोग तमाम एजेंसियां करती आई हैं। यह माफिया तमाम तरह के अपने हितों को साधने के लिए लड़ाई लड़ते हैं। पूर्व विदेश सचिव कहते हैं कि यूक्रेन की सरकार में भी कुछ अंतरराष्ट्रीय माफिया सक्रिय हैं। इसे रूस के रणनीतिकार, वहां सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां बखूबी समझती हैं।

आखिर क्या है राष्ट्रपति जेलेंस्की के दुस्साहस का राज?
पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि लड़ाई में रूस को कमजोर करना और करते जाना अमेरिका का मुख्य उद्देश्य है। यह काफी पहले से है। अमेरिका के रणनीतिकारों को लग रहा है कि रूस को कमजोर करना चीन की तुलना में आसान है। इसलिए यूक्रेन संकट के लिए अमेरिका को बहुत पाक-साफ नहीं कहा जा सकता। दूसरे एक चर्चा पूरी दुनिया में है। यूक्रेन के राष्ट्रपति आखिर इतना दुस्साहस कहां से ला रहे हैं? नाटो देश उन्हें बहुत पहले से नाटो में शामिल करने का भरोसा दे रहे हैं। यूरोपीय यूनियन भी यही कर रहे हैं। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने दो दिन पहले भी यूरोपीयन यूनियन में तत्काल शामिल करने की मांग की। रूस का हमला होने तक यूक्रेन नाटो में शामिल नहीं हो सका था। अमेरिका ने यूक्रेन को मझधार में छोड़ दिया और किसी भी सैन्य कार्रवाई से इनकार कर रहा है। वह इसके लिए आर्थिक प्रतिबंधों का सहारा ले रहा है। जबकि इसके समानांतर फ्रांस और जर्मनी यूक्रेन की मदद में कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं। 

मैक्रों लगातार कर रहे पुतिन से बात

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की लगातार व्लादिमीर पुतिन से चर्चा हो रही है। मैक्रों चाहते हैं कि यथाशीघ्र यूक्रेन संकट का समाधान हो। पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि नाटो सदस्य देश और अमेरिका की मंशा कहीं न कहीं यूक्रेन के संकट को लंबे समय तक खींचने की है। यह एक धारणा है कि रूस जितना समय तक यूक्रेन में सैन्य कार्रवाई में उलझा रहेगा, उसकी अर्थव्यवस्था को चपत लगेगी।

राष्ट्रपति पुतिन ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से फोन पर डेढ़ घंटे ताजा हालात पर चर्चा की। समझा जा रहा है कि यूक्रेन संकट पर फ्रांस के राष्ट्रपति और जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्कॉल्ज के रुख में काफी हद तक समानता है। जर्मनी की एक सांसद एलिस वाइडेल ने यूक्रेन के ताजा संकट के लिए नाटो को जिम्मेदार ठहराया है। एलिस का कहना है कि यूक्रेन और नाटो को एक निष्पक्ष स्टेट की तरह व्यवहार करने की गारंटी देनी चाहिए।

भारत के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं कि एलिस की सलाह पर अमल हो जाता तो यह संकट ही पैदा न होता। फिलहाल रूस की दो मंशा साफ दिखाई पड़ रही है। पहली तो यह कि यूक्रेन निष्पक्ष देश की तरह व्यवहार करे, नाटो में न शामिल होने और विसैन्यीकरण की शर्त माने तो तत्काल संघर्ष विराम संभव है। इसके बाद रूस की फौज यूक्रेन से लौट आएगी। यदि ऐसा नहीं होता तो रूस अपनी संप्रभुता और सुरक्षा चिंताओं से किसी तरह का समझौता करने के पक्ष में नहीं है।
 
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जितनी जल्दी हल निकले, उतना अच्छा : पूर्व ले. जन. शर्मा

भारतीय सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा का कहना है कि कुल मिलाकर जितना जल्द यूक्रेन संकट का समाधान निकल आएगा, उतना ही अच्छा है। जितना यह लड़ाई लंबी खिंचेगी, उतना ही निर्दोष लोगों की जान जाएगी। जनरल शर्मा कहते हैं कि नागरिक क्षेत्र में लड़ाई छिड़ने पर लोगों के बड़े पैमाने पर मारे जाने की संभावना है।
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