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यूक्रेन संकट का असर: यूरोप के ललाट पर गहरी हो गई हैं तेल और गैस की चिंता से पड़ीं लकीरें

Sat, 26 Feb 2022 04:16 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन

सार

यूक्रेन पर रूसी हमले से कई नई परिस्थितियां पैदा हुई हैं। एक आशंका यह है कि अशांति जारी रहने का असर तेल और गैस की सप्लाई व्यवस्था पर पड़ सकता है। अगर किसी पाइपलाइन पर बमबारी या उसमें तोड़फोड़ हुई, तो उससे जुड़े इलाकों में लंबे समय तक सप्लाई रुक जाएगी। दूसरी चुनौती, रूस पर पश्चिमी देशों की कार्रवाई से आने की आशंका है...
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क्रूड ऑयल पर रूस-यूक्रेन युद्ध का असर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूक्रेन पर रूस के हमले के साथ कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी उछाल ने विकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी है। 2014 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 100 डॉलर बैरल के ऊपर पहुंच गईं। विश्लेषकों का कहना है कि तेल की इस महंगाई का ऊर्जा बाजार और भू-राजनीतिक स्थितियों के लिए गंभीर परिणाम होंगे।

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यूरोप और अमेरिका में तेल और प्राकृतिक गैस पहले से ही अपेक्षाकृत महंगी दरों पर मिल रहे हैं। नए हालात से ज्यादा समस्या यूरोप के लिए पैदा हुई है, जिसकी जरूरत का 40 फीसदी से ज्यादा तेल और गैस की सप्लाई रूस से होती है। विश्लेषकों का कहना है कि तेल की कीमत अगर अपने मौजूदा स्तर पर बनी रही, तो यूरोप और अमेरिका में मुद्रास्फीति की दर और बढ़ेगी। इन दोनों स्थानों के लोग पहले से ही असामान्य महंगाई से परेशान हैं।

स्विफ्ट से बाहर करने पर होगी दिक्कत

यूक्रेन पर रूसी हमले से कई नई परिस्थितियां पैदा हुई हैं। एक आशंका यह है कि अशांति जारी रहने का असर तेल और गैस की सप्लाई व्यवस्था पर पड़ सकता है। अगर किसी पाइपलाइन पर बमबारी या उसमें तोड़फोड़ हुई, तो उससे जुड़े इलाकों में लंबे समय तक सप्लाई रुक जाएगी। दूसरी चुनौती, रूस पर पश्चिमी देशों की कार्रवाई से आने की आशंका है। खास कर अगर आगे चल कर रूस को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के स्विफ्ट सिस्टम से हटा दिया गया, तो इसे पक्का माना जा रहा है कि रूस यूरोप के लिए तेल और गैस की सप्लाई रोक देगा।

नए हालात से जलवायु परिवर्तन रोकने की कोशिशों को भी झटका लगने का अंदेशा है। रूसी सप्लाई को लेकर भय बढ़ने की वजह से यूरोप में फिर से कोयले का उपयोग बढ़ सकता है। उससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के जो लक्ष्य यूरोपीय देशों ने तय किए हैं, उन्हें हासिल करना कठिन हो जाएगा। अमेरिका में भी ये स्थिति बन सकती है। इसके अलावा यह संभव है कि रूस पर पश्चिमी देशों की निर्भरता घटाने के लिए अमेरिका को तेल और गैस की तलाश और खुदाई में अधिक संसाधन झोंकने लगे। उससे उत्सर्जन बढ़ेगा।

अमेरिका ने जारी की एडवाइजरी

एक अंदेशा रूसी की जवाबी कार्रवाइयों को लेकर भी है। ये अनुमान लगाया गया है कि रूस पश्चिमी देशों के गैस और तेल नेटवर्क पर साइबर हमले कर सकता है। उस हालत में ये नेटवर्क सामान्य ढंग से काम नहीं कर पाएंगे। अमेरिकी विश्लेषकों ने ऐसे हमलों का सामना करने लिए तैयार रहने की सलाह दी है।

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मार्केटिंग एजेंसी एसएंडपी ग्लोबल प्लैट्स ने कहा है कि तेल और गैस के बाजार में रूस का बड़ा दखल है। वह प्रति दिन यूरोप को 27 लाख बैरल कच्चे तेल का निर्यात करता है। इसे देखते हुए मौजूदा हालात में तेल बाजार का चिंतित होना लाजिमी है।

अमेरिकी कंपनी रैपिडान एनर्जी ग्रुप के अध्यक्ष रॉबर्ट मैकनेली ने वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा है कि अब बाइडन प्रशासन के पास एक ही वास्तविक विकल्प यह है कि वह ईरान के साथ जल्द परमाणु करार पर दस्तखत करे। साथ ही सऊदी अरब को तेल का उत्पादन बढ़ाने के लिए राजी करे। तभी यूरोप और अमेरिका तेल की पर्याप्त सप्लाई को लेकर आश्वस्त हो सकेंगे।

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