यूक्रेन पर रूस के हमले के साथ कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी उछाल ने विकसित अर्थव्यवस्थाओं के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी है। 2014 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 100 डॉलर बैरल के ऊपर पहुंच गईं। विश्लेषकों का कहना है कि तेल की इस महंगाई का ऊर्जा बाजार और भू-राजनीतिक स्थितियों के लिए गंभीर परिणाम होंगे।
यूक्रेन पर रूसी हमले से कई नई परिस्थितियां पैदा हुई हैं। एक आशंका यह है कि अशांति जारी रहने का असर तेल और गैस की सप्लाई व्यवस्था पर पड़ सकता है। अगर किसी पाइपलाइन पर बमबारी या उसमें तोड़फोड़ हुई, तो उससे जुड़े इलाकों में लंबे समय तक सप्लाई रुक जाएगी। दूसरी चुनौती, रूस पर पश्चिमी देशों की कार्रवाई से आने की आशंका है। खास कर अगर आगे चल कर रूस को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के स्विफ्ट सिस्टम से हटा दिया गया, तो इसे पक्का माना जा रहा है कि रूस यूरोप के लिए तेल और गैस की सप्लाई रोक देगा।
नए हालात से जलवायु परिवर्तन रोकने की कोशिशों को भी झटका लगने का अंदेशा है। रूसी सप्लाई को लेकर भय बढ़ने की वजह से यूरोप में फिर से कोयले का उपयोग बढ़ सकता है। उससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के जो लक्ष्य यूरोपीय देशों ने तय किए हैं, उन्हें हासिल करना कठिन हो जाएगा। अमेरिका में भी ये स्थिति बन सकती है। इसके अलावा यह संभव है कि रूस पर पश्चिमी देशों की निर्भरता घटाने के लिए अमेरिका को तेल और गैस की तलाश और खुदाई में अधिक संसाधन झोंकने लगे। उससे उत्सर्जन बढ़ेगा।
एक अंदेशा रूसी की जवाबी कार्रवाइयों को लेकर भी है। ये अनुमान लगाया गया है कि रूस पश्चिमी देशों के गैस और तेल नेटवर्क पर साइबर हमले कर सकता है। उस हालत में ये नेटवर्क सामान्य ढंग से काम नहीं कर पाएंगे। अमेरिकी विश्लेषकों ने ऐसे हमलों का सामना करने लिए तैयार रहने की सलाह दी है।