यूक्रेन में जारी युद्ध के बीच ऊर्जा की आपूर्ति सबसे बड़ी चिंता बन कर उभरी है। बताया जाता है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस बात से परिचित हैं। इसीलिए वे आश्वस्त हैं कि पश्चिमी देश चाहे जितना शोर मचा लें, वे रूस की कमर तोड़ सकने लायक कदम नहीं उठाएंगे।
वेबसाइट एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध रूस को दंडित करने के लिए लगाए हैं। इसके बावजूद अभी तक हकीकत यह है कि रूस के प्रमुख वित्तीय स्रोत ठप नहीं हुए हैं। यह जरूर है कि उद्योग, मीडिया, वित्त और खेल के क्षेत्र में रूस पर तगड़ी मार पड़ी है। साथ ही रेटिंग एजेंसियों ने उसका दर्जा गिरा दिया है, जिससे उसे आगे वैश्विक संस्थानों से कर्ज मिलने की संभावना न्यूनतम हो गई है। लेकिन रूस के ऊर्जा निर्यात पर अभी तक कोई असर नहीं हुआ है, जबकि यही उसकी अर्थव्यवस्था का प्रमुख सहारा है।
अमेरिका के ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआईए) ने एक ताजा टिप्पणी में कहा है- ‘रूस 2020 में दुनिया में पेट्रोलियम और लिक्विफाइड गैस का (अमेरिका और सऊदी अरब के बाद) तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक था। ड्राई नेचुरल गैस का वह (अमेरिका के बाद) दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक था।’ क्षेत्रफल के लिहाज से रूस दुनिया का सबसे बड़ा देश है। दुनिया के कुल तेल भंडार का छह फीसदी हिस्सा उसके पास है। जबकि दुनिया में प्राकृतिक गैस के कुल ज्ञात भंडार का 20 प्रतिशत हिस्सा उसके पास है। तेल और गैस के कारोबार में रूस में चार लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है।
यूरोप मे जर्मनी रूसी गैस का सबसे बड़ा ग्राहक है। उसके बाद इटली और फ्रांस आते हैं। विश्लेषकों के मुताबिक रूस की ये हैसियत यूक्रेन के लिए बड़ी परेशानी की वजह बना हुआ है। यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्री कुलेबा ने मांग की है कि पश्चिमी सरकारें रूस पर पूरा प्रतिबंध लगाएं। यूरोपियन यूनियन के विदेश नीति प्रमुख जोसेफ बॉरेल ने कहा भी है कि इस बारे में विचार किया जा रहा है।
लेकिन यूक्रेन में प्राकृतिक गैस की सरकारी कंपनी नेफ्तोगैज के पूर्व प्रमुख आंद्रिय कोबोलेव ने कहा है- ‘मुझे व्लादिमीर पुतिन और उनकी टीम के साथ काम करने का अनुभव है। उनकी सोच का एक मुख्य आधार यह है कि ऊर्जा सप्लाई पश्चिम के लिए इतनी अहम है कि रूस चाहे जो करे, पश्चिमी देश तेल और गैस मांगने के लिए उसके सामने घुटने टेके रहेंगे।’