अजरबैजान और अर्मीनिया के बीच नागोरनो- काराबाख विवाद पर समझौता कराने में तुर्की की अहम भूमिका रही। अजरबैजान मुस्लिम बाहुल्य देश है। नागोरनो- काराबाख के शुशा (जिसे अर्मीनिया में शुशी कहा जाता है) क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए कुछ समय से अजरबैजान और अर्मीनिया युद्ध पर उतर आए थे। सोमवार को रूस की मध्यस्थता से अजरबैजान और अर्मीनिया के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत अर्मीनिया शुशा इलाके को अजरबैजान को सौंप देगा। अब रूस की सेना नागोरनो- काराबाख इलाके में पहरा देगी। तुर्की भी वहां निगरानी करेगा।
नाराज लोगों ने प्रदर्शन किया
इस समझौते को ईसाई बाहुल्य अर्मीनिया की हार के रूप में देखा गया है। समझौते की खबर आते ही हजारों लोग अर्मीनिया की राजधानी येरेवान में इकट्ठे हो गए। नाराज लोगों की इस भीड़ ने सरकारी भवनों पर हमला बोल दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री निकोल पाशिनयान पर समर्पण कर देने का आरोप लगाया और उनसे इस्तीफे की मांग की।
पाशिनयान ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा, ''हाल में हुई घटनाएं इतनी दुखद हैं कि उनका बयान नहीं किया जा सकता। उधर अजरबैजान के प्रधानमंत्री इलहाम अलीयेव ताजा समझौते को ऐतिहासिक बताया और कहा कि इससे अर्मीनिया और उनके देश के बीच नागोरनो- काराबाख विवाद का अंत हो जाएगा।''
राजधानी बाकू में उत्सव जैसा माहौल
मंगलवार को अर्मीनिया की राजधानी बाकू में उत्सव जैसा माहौल था। वहां लोग अपने देश के साथ-साथ तुर्की और पाकिस्तान के झंडे भी लहरा रहे थे। पाकिस्तान ने हालिया युद्ध में अजरबैजान के साथ एकजुटता जताई थी। पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष ने कहा था कि उसकी सेना अजरबैजान का साथ देने के लिए तैयार है। तुर्की ने इस मौके पर सैनिक साजो-सामान से अजरबैजान की मदद की। इसलिए मदद के लिए अजरबैजान ने औपचारिक रूप से दोनों देशों का आभार जताया है।
जानकारों का मानना है कि तुर्की और पाकिस्तान ने नागोरनो- काराबाख विवाद पर भड़के युद्ध को इस्लामी एकजुटता दिखाने का मौका बनाया। तुर्की और पाकिस्तान आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने मामलों में ऐसा रुख अपना रहे हैं। नागोरनो- काराबाख विवाद में उनकी मदद से अजरबैजान की मिली जीत से उनका मनोबन और बढ़ने का अंदाजा लगाया गया है। गौरतलब है कि हाल में कश्मीर मामले में तुर्की ने पाकिस्तान के रुख का पुरजोर समर्थन किया है। उसने संयुक्त राष्ट्र में भी पाकिस्तान के रुख के साथ एकजुटता दिखाई थी।
पश्चिम एशिया के विश्लेषकों का कहना है कि तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन तुर्की को इस्लामी विश्व के नेता के रूप में पेश करने की महत्त्वाकांक्षा रखते हैं। जैसा एक समय ओटोमन साम्राज्य खुद को दुनिया भर के मुसलमानों का प्रतीक समझता था, एर्दोआन तुर्की को फिर से उस हैसियत में लाना चाहते हैं। तब पैन- इस्लामिज्म का विचार फैलाने की कोशिश हुई थी। इसका मतलब था कि सारी दुनिया के मुसलमान एक कौम हैं और ओटोमोन साम्राज्य (आज का तुर्की) उनकी भावनाओं का प्रतीक है। कहा जा रहा है कि नागोरनो- काराबाख विवाद में एर्दोआन ने अपनी इसी बड़ी योजना के तहत दखल दिया।
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे कदम दरअसल अपने देश में अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के एर्दोआन के प्रयासों का हिस्सा हैं। तुर्की में एर्दोआन ने धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को अधिनायकवादी इस्लामी व्यवस्था में तब्दील कर दिया है। इसलिए वे लगातार ऐसे मामलों में देश को उलझाए रखते हैं, जिससे लोगों में मजहबी भावनाएं भड़की रहें। ये विश्लेषक नागोरनो- काराबाख से कश्मीर तक उनकी सरकार के रुख को उनकी इसी योजना का हिस्सा मानते हैं।