यूनिवर्सिटी ऑफ ओटावा के कानूनविद और महामारी रोग विशेषज्ञ डॉ. आमिर अट्टारन ने कहा, हमें पता है कि चीनी वैज्ञानिकों ने जानलेवा वायरस जहां भेजने थे भेज दिए। वायरसों की कई प्रजातियां भी भेजीं जिससे चीन उसे और अधिक जानलेवा और हानिकारक बना सके। इसका सीधा संबंध चीन की सेना से था।
चीन को हथियार के रूप में इस्तेमाल से गुरेज नहीं
डॉ. अट्टारन का कहना है कि किसी पैथोजन या वायरस को लैब में ले जाकर उसका म्यूटेशन किया जाता है, जिससे वो अधिक घातक और संक्रामक हो सके। वुहान की लैब में ऐसा हो सकता है क्योंकि हमने इबोला और निपाह वायरस की आपूर्ति उसे की जो पूरी तरह गलत फैसला था। चीन वायरस का गलत या हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करेगा।
एटीआईपी के दस्तावेजों के अनुसार 31 मार्च 2019 को वायरस का पैकेज कनाडा के मालवाहक विमान से बीजिंग पहुंचा। इसके बाद पैकेज लेने वाले ने मेल से जानकारी दी कि उसे पैकेज सुरक्षित मिल गया है लेकिन मेल किसने लिखी उसका नाम नहीं था। इसी मेल में डॉ. क्यू और एंडर्स को भी धन्यवाद किया था।
मैं हतप्रभ कि कनाडा ने ऐसा किया
डॉ. अट्टारन ने कहा, मैं इस बात से हतप्रभ हूं कि कनाडा ने ऐसा किया। कनाडा सरकार ने वायरस का जेनेटिक मैटेरियल चीन को दिया। वे कहते हैं कि इबोला पर अध्ययन 2018 में प्रकाशित हुआ था और उसके तीन महीने पहले ही वायरस को चीन भेजा गया।
इसमें बीजिंग में स्थित चाइनीज मिलिट्री मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता भी शामिल थे। वे कहते हैं कि ये सब गतिविधियां षड्यंत्र की ओर इशारा करती हैं कि कोरोना के लिए कनाडा और वुहान की लैब मुख्य साजिशकर्ता हैं।