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यहां के कैलेंडर में 30 दिसंबर, 2011 कभी आया ही नहीं

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उत्तर कोरिया के अपने टाइम जोन बदलने के साथ ही ग्रीनविच मीन टाइम, ईस्टर्न स्टैंडर्ड टाइम और लॉर्ड होवे स्टैंडर्ड टाइम में एक और टाइम जोन प्योंगयांग टाइम जोन से जुड़ चुका है। उत्तर कोरिया के अपने टाइम ज़ोन बदलने के साथ ही ग्रीनविच मीन टाइम, इस्टर्न स्टैंडर्ड टाइम और लॉर्ड होवे स्टैंडर्ड टाइम में एक और टाइम ज़ोन प्योंगयांग टाइम ज़ोन जुड़ चुका है।
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टाइम ज़ोन बदलने के मायने उतने ही राजनीतिक, कूटनीतिक, और प्रतिरोधात्मक भी हैं जितना कि यह समय के लिहाज़ से है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग टाइम ज़ोन के होने की कहानी एक बहुत ही अव्यवस्थित सा मामला रहा है। ऐसा क्यों है कि 12.00 ग्रीनविच मीन टाइम, लॉर्ड होवे स्टैंडर्ड टाइम में 20.00 और लुनार स्टैंडर्ड टाइम (अनाधिकारिक) में 17.14 हैं।

लोगों में समय को लेकर भ्रम होना शुरू हुआ

इसकी शुरुआत ट्रेन से होती है जिसकी वजह से लोगों में समय को लेकर भ्रम होना शुरू हुआ। रेलवे ने एक तरफ़ जहां किसी देश की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है वहीं दूसरी तरफ़ इसने दुनिया में एक स्टैंडर्ड टाइम की ज़रूरत को भी समझाया।

19वीं सदी में रेलवे की यात्रा ने लोगों के सफ़र को इतना तेज़ कर दिया कि उन्हें एक जगह से दूसरे जगह में समय का अंतर पता चलने लगा। रेलवे का जैसे-जैसे विस्तार हुआ वैसे-वैसे एक समान समय प्रणाली की ज़रूरत महसूस की जाने लगी। अमरीका में हर शहर ने अपना समय तय किया हुआ था जिससे ट्रेन से सफ़र करके दूसरे शहर में पहुंचने वालों और ट्रेन चलाने वालों को समय का भ्रम होता था।

ट्रेन चालकों ने अमरीका को 100 टाइम ज़ोन में बांटा हुआ था। बाद में पूरे अमरीका को चार टाइम ज़ोन में बांटा गया। ब्रिटेन में भी रेलवे की वजह से एक ही टाइम ज़ोन निर्धारित किया गया। भारत में ब्रिटेन की ही तरह एक टाइम ज़ोन है।

यह लंबे देशांतर में फैला हुआ

चीन जैसे विशाल देश में भी एक ही टाइम ज़ोन है लेकिन चूंकि यह लंबे देशांतर में फैला हुआ है इसलिए यहां कुछ अजीबोग़रीब समय-सारणी देखने को मिलती है। पूरे देश को बीजिंग के समय के साथ रखा जाता है। उन क्षेत्रों को भी जो बीजिंग से देश के विपरीत छोर पर स्थित है। इससे यह होता है कि इन इलाक़ों में ज़्यादा समय का दिन होता है।

गर्मी के दिनों में तो आप मध्यरात्रि के वक़्त में सूर्यास्त देख सकते हैं। पूरे देश के लिए एक ही टाइम ज़ोन रखने का फ़ैसला राजनीतिक है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को क़ायम करना है। इसकी शुरुआत 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन आने के साथ हुई।

राजनीतिक कारणों के कारण टाइम ज़ोन के निर्धारण का एक उदाहरण सामोआ का भी है। सामोआ ने 2011 में नज़दीकी टाइम ज़ोन का मामला होने के कारण ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के तरफ़ रहने के लिए अंतरराष्ट्रीय डेटलाइन का उल्लंघन कर दिया। इसका नतीजा यह निकला कि सामोआ में कभी तीस दिसंबर 2011 हुआ ही नहीं।
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नेपाल के मामले में देख सकते

कभी-कभी इस मामले में भूगोल भी बड़ी भूमिका निभाता है। इसे हम नेपाल के मामले में देख सकते हैं। जब लगभग सभी देशों में एक घंटे के अंतराल वाला टाइम ज़ोन है, कुछ में आधे घंटे के अंतराल वाला तो नेपाल समेत दुनिया की दो जगह ऐसी है जहां 15 मिनट के अंतराल वाला टाइम ज़ोन है। दूसरी जगह चाथम द्वीप है।

नेपाल का समय ग्रीनविच मीन टाइम से पांच घंटे 45 मिनट आगे हैं। काठमांडू के पूर्व में स्थित गौरीशंकर पहाड़ पर नेपाल स्टैंडर्ड टाइम का देशांतर तय होता है। इसीलिए नेपाल और भारत के बीच 15 मिनट के समय का फ़ासला होता है।

उत्तर और दक्षिण ध्रुव पर सभी देशांतर रेखाओं के मिल जाने के कारण दोनों ध्रुवों का कोई आधिकारिक टाइम ज़ोन नहीं होता है। इंसान ने ना सिर्फ़ धरती पर बल्कि चांद पर भी समय की इस व्यवस्था को बैठाने की कोशिश की है।

1969 में अमरीका के चांद पर पहुंचने के बाद 1970 में अमरीका के हैडन प्लैनेटेरियम के खगोल विज्ञानी केनेथ एल फ्रेंकलिन ने चांद पर चहलक़दमी करने वालों के लिए एक घड़ी का आविष्कार किया। स्वीडन के एक संगठन ने चांद पर 'भविष्य में बनने वाली कॉलोनियों' के लिए लुनर स्टैंडर्ड टाइम का भी आविष्कार किया है।
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