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जब ये देश डूब जाएंगे तो आखिर लोगों का क्या होगा?

Sun, 28 Jun 2015 03:59 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
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यहां के रिसॉर्ट अलग अलग द्वीपों पर बने हैं। कोई पर्यटक 40 डॉलर प्रति पैग की दर पर साफ पानी के पूल में शैंपेन के घूंट भर सकता है। इसके बाद रुसी कैवियार और वागेयू स्टीक खा सकता है। एयर कंडीशन सुइट में आधुनिकतम वीडियो गेम खेल सकता है। दुनिया की हर सुविधा आपके सामने मिनटों में हाजिर हो जाएगी।
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लेकिन इन सबके बावजूद मालदीव के दुनिया के नक्शे से गायब होने का खतरा है। दरअसल मालदीव दक्षिण एशिया का वैसा देश है जिस पर जलवायु परिवर्तन के चलते सबसे ज्यादा खतरा बना हुआ है। लेकिन यहां के होटलों और रिसॉर्ट में काम करन वालों के चेहरों पर हमेशा मुस्कान देखने को मिलती है।

एक रिसॉर्ट में काम करने वाले मालदीवी नागरिक मंसूर कहते हैं, "जलवायु परिवर्तन को लेकर मैं चिंतित हूं, समुद्री वनस्पितियों, पर्यावरण और प्रदूषण सबको लेकर। लेकिन मैं क्या कर सकता हूं, मैं नहीं जानता हूं?"
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कितना गंभीर है खतरा?

जलवायु परिवर्तन के चलते दुनिया भर के उन शहरों पर खतरा बढ़ा है जो समुद्री किनारे पर स्थित हैं। इसमें मियामी, एमस्टर्डम और शंघाई जैसे शहर शामिल हैं। इसके अलावा छह से लेकर दस प्रायद्वीपय देशों को अस्तित्व भी जलवायु परिवर्तन में खत्म हो सकता है।

हालांकि अभी इसके बारे में जानना कि भविष्य में क्या होगा, असंभव है। कुछ शोधकर्ताओं का तो ये भी कहना है कि समुद्र का जल स्तर बढ़ने के बावजूद भी कुछ प्रायद्वीप पूरी तरह से नहीं डूबेंगे।

हालांकि कुछ वैज्ञानिकों की राय ये भी हम कितनी भी कोशिशें क्यों नहीं कर लें कुछ देशों का अस्तित्व का खत्म हो ही जाएगा। ऐसा होगा समुद्र में जल स्तर एक या दो फुट बढ़ने से.पेनसेल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के जाने माने अंतरिक्ष विज्ञान शास्त्री माइकल मैन का कहना है, "समुद्र में निचले स्तर पर मौजदू देशों को हम डूबने से नहीं बचा सकते।

"हालांकि अगर हम मानवजनित तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ाने में कामयाब हो जाएं तो डूबने वाले ज्यादातर देश समुद्र तल से ऊपर ही रहेंगे। ज्यादा विकसित देशों और हिस्सों में तापमान 2 से 3 डिग्री तक ज्यादा हो सकता है।

देश का डूबना तय

लेकिन बड़ा सवाल तो ये है कि अगर कोई देश डूब जाता है, गायब हो जाता है तो क्या होगा? क्योंकि इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ है, कि किसी देश का अस्तित्व मिट गया हो। अब तक ऐसी स्थिति नहीं देखने को मिली है कि जब पूरे देश की आबादी के पास कोई आधार नहीं होगा, ना तो कानूनी, ना ही सांस्कृतिक और ना ही आर्थिक।

कोलंबिया लॉ स्कूल के साबीन सेंटर फॉर क्लाइमेंट चेंज के निदेशक माइकल गेरार्ड मानते हैं, "तब एक नई तरह की अंतरराष्ट्रीय नागरिकता का दौर शुरू होगा। हालांकि मेरा मानना है कि प्रायद्वीपीय देशों को इस शताब्दी तक कुछ नहीं हो रहा है।

"जाहिर है तब एक साथ कई सवाल उभरते हैं? तब क्या होगा जब कई देश डूब जाएंगे। क्या उनकी संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता भी डूब जाएगी। क्या उन्हे विशेष आर्थिक क्षेत्र घोषित किया जाएगा या फिर मछली पालन और खनिज उत्खनन के लिए उन्हें उस इलाके का जल अधिकार मिल जाएगा? लोग कहां जाएंगे? उनकी नागरिकता का क्या होगा? क्या ग्रीन गैस उत्सर्जित करने वाले लोगों और देशों के खिलाफ उनका कोई कानूनी मामला भी बनेगा? ये सारे सवाल आपस में गुथे हुए हैं और बेहद मुश्किल हैं।

अगर द्वीप वाले देश गायब होने शुरू हुए तो दुनिया भर में संकट की स्थिति पैदा होगी। बांग्लादेश, नील डेल्टा, मेकांग डेल्टा सहित तमाम दूसरी जगहों पर भारी संख्या में विस्थापन भी देखने को मिलेगा।

लाखों लोगों का विस्थापन

गेरार्ड की आशंका तो ये भी है कि सीरिया और अफ्रीका में मौजूदा स्थिति में जिस तरह से सैकड़ों हजारों लोग राजनीतिक और आर्थिक तौर पर विस्थापन झेल रह हैं उससे भी विकट संकट पैदा होगा। गेरार्ड के मुताबिक ये संकट 85 सालों बाद सबके सामने होगा।

मौजूदा समय में पर्यावरण के चलते विस्थापन का सामना करने वाले लोगों की समस्याओं के लिए किसी तरह की अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं है। नवंबर, 2014 में न्यूज़ीलैंड की एक अदालत के न्यायाधीश ने किरिबाती नागरिक को पर्यावरण के आधार पर शरणार्थी का दर्जा दिए जाने से इनकार किया था।

बीते दो दशक के दौरान ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में कम से कम 20 ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। वैसे, जब संयुक्त राष्ट्र इन देशों की पहचान को मान्यता देता रहेगा, उनके दो अक्षरों वाले कोड का इस्तेमाल होता रहेगा, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और पासपोर्ट की पहचान काम करती रहेगी।

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देश की पहचान का क्या होगा?

गैर सरकारी संस्था आईकैन की तकनीकी सेवाओं के निदेशक किम डेविस कहते हैं, "जब किसी देश का जमीनी हिस्सा गायब होगा, तब ये नई स्थिति होगी, लेकिन ऐसा नहीं होगा कि उसको संभाला नहीं जा सकेगा। संयुक्त राष्ट्र की सूची में रहने पर उनकी पहचान बनी रहेगी।

"प्रशांत महासागर में करीब 34 लाख किलोमीटर के दायरे में फैले द्वीपों के देश किरिबाती के लोगों को मालूम है कि उनके साथ क्या होने वाला है। किरिबाती गणराज्य के प्रवक्ता रिमोन रिमोन कहते हैं, "विज्ञान के नतीजे एकदम साफ है। अगर दूसरे देश कार्बन गैस का उत्सर्जन बिलकुल कम कर देते हैं तो भी 30 से 35 साल के बाद हमारा द्वीप डूब जाएगा।

"यही वजह है किरिबाती के राष्ट्रपति एनोटे टाँग ने डिग्निटी के साथ माइग्रेशन का कांसेप्ट शुरू किया है। इसके मुताबिक खास तरह के प्रशिक्षण हासिल करने पर किरिबाती के लोगों को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में रहने की पात्रता मिल जाती है बाद में वे पूर्ण से माइग्रेटेड हो पाएंगे।

खुद राष्ट्रपति ने इसी नजरिए से फिजी द्वीप में जमीन खरीदी है। रिमोन इसके बावजूद कहते हैं, "लेकिन हमारे सामने पहचान खोने का खतरा है, संस्कृति और कस्टम पर खतरा है। लेकिन हमें तैयारी करनी होगी ताकि 50 साल बाद भी एक किरिबाती देश कायम रहे।"
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