इसलिए एक क्रांतिकारी समाधान की जरूरत महसूस की जाने लगी थी, और वो था पश्चिमी बर्लिन का अलगाव। यानी वो तरीका जिससे पूर्वी जर्मनी के लोगों को पूर्वी इलाके में रखा जाए और पश्चिमी जर्मनी का पूर्वी जर्मनी से संपर्क भी बना रहे। पूर्वी जर्मनी के अधिकारी पचास के दशक में इस बात पर निजी तौर पर जोर देते रहे थे, लेकिन सोवियत संघ ने कूटनीतिक हल की उम्मीद में इस पर वीटो कर दिया था। मई, 1961 में पूर्वी जर्मनी के नेता वॉल्टर उलब्रिच्ट ने सोवियत संघ से इस सिलसिले में औपचारिक तौर पर आग्रह किया। इसी साल जून में सोवियत संघ के निकिता ख्रुश्चेव और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की मुलाकात हुई। ये मुलाकात तल्ख रही और दोनों के भाषण टीवी पर दिखाए गए।
बर्लिन की घेरेबंदी
मुलाकात का ही नतीजा था कि जुलाई के आखिर में सोवियत संघ ने बर्लिन की दीवार बनाने की योजना को मंजूरी दे दी। दीवार खड़ी करने की योजना को इस कदर गुप्त रखा गया कि पूर्वी जर्मनी छोड़ने की चाहत रखने वाले लोगों के बीच भगदड़ न मच जाए। राष्ट्रपति कैनेडी के 26 जुलाई, 1961 के भाषण के ठीक एक दिन बाद सोवियत संघ ने फैसला कर लिया। ख्रुश्चेव ने पूर्वी जर्मनी में सोवियत संघ के राजदूत के मार्फत वॉल्टर उलब्रिच्ट को बर्लिन की कंटीले बाड़ से घेराबंदी का संदेश भिजवाया। संदेश स्पष्ट था, ये काम किसी भी सूरत में शांति समझौता खत्म होने से पहले पूरा कर लिया जाना चाहिए। हकीकत में सोवियत संघ के नेता उसी कूटनीतिक संकट को फिर से हवा दे रहे थे जिसकी बुनियाद उन्होंने नवंबर, 1958 में रखी थी।
क्या हुआ था नवंबर, 1958 में
सोवियत संघ ने उस समय पश्चिमी ताकतों से कहा था कि शांति समझौते के लिए तैयार हो जाओ या फिर वेस्ट बर्लिन खाली कर दो। तब पश्चिमी ताकतों को इस शांति समझौते के तहत मजबूरन पूर्वी जर्मनी को एक स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता देनी पड़ी और जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक वजूद में आया। हालांकि दुनिया ने पूर्वी जर्मनी को सोवियत संघ के कठपुतली देश के तौर पर ही देखा। संप्रभुता मिलते ही पूर्वी जर्मनी को पश्चिमी बर्लिन से वेस्ट जर्मनी को जोड़ने वाले रास्तों पर नियंत्रण हासिल हो गया। इसमें सड़कें, रेलवे और हवाई यातायात तीनों थे। कैनेडी ने अपने भाषण में ये साफ कर दिया कि वे पश्चिमी बर्लिन को बचाने के लिए युद्ध की हद तक जाने को तैयार हैं, लेकिन पूर्वी बर्लिन के मुद्दे पर वे खामोश ही रहे। और वही हुआ, जिसका अंदाजा था। कम्युनिस्टों को अपने इलाके में पूरी छूट मिल गई।
इसके बाद से 'ऑपरेशन पिंक' की शुरुआत हुई। बेहद खुफिया तरीके से पश्चिमी बर्लिन की घेराबंदी की योजना पर काम शुरू हो गया। कई आला सरकारी अधिकारियों को इस योजना से अनजान रखा गया। कहा जाता है कि पूर्वी जर्मनी में केवल 60 लोगों को ये पता था कि ऐसा कुछ होने जा रहा है। ईस्ट जर्मनी कम्युनिस्ट पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले एरिक होनेकेर भी इनमें से एक थे। दशक भर बाद वे पूर्वी जर्मनी के नेता बने। पोलित ब्यूरो में उनका दर्जा सुरक्षा सचिव का था और वे देश के आंतरिक और बाह्य दोनों ही मोर्चों पर रक्षा के लिए जिम्मेदार थे। इस काम को शनिवार की रात शुरू होकर रविवार सुबह तक खत्म कर लिया जाना था। 17 जून, 1953 के हमले को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी की कड़वी यादें इससे जुड़ी थी। 24 जुलाई को पार्टी के सुरक्षा विभाग ने ये हिसाब लगाया कि 27,000 लोगों पर काम लगाए जाने की जरूरत होगी और इस काम में 500 टन कंटीले तार लगेंगे।
एक अनिश्चित विकल्प
लोहे के कंटीले तार को सीमावर्ती इलाकों से आहिस्ता-आहिस्ता राजधानी पहुंचाया गया। कंटीले बाड़ से घेराबंदी के काम को अंजाम देने के लिए सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर टैंक तैनात किए गए। गोपनीयता इस कदर बरती गई तो पश्चिमी ताकतों को इसकी जरा सी भी भनक तक नहीं लगी। हालांकि सीआईए और ब्रितानी खुफिया एजेंसी ने अतीत में इसकी संभावना जरूर जाहिर की थी। पश्चिमी जर्मनी के खुफिया संगठन ने चांसलर कोनराड एडेनाउएर को इस योजना के बारे में जानकारी दी थी। इतनी बात तो तय थी कि पश्चिमी देशों को इसका अंदाजा था कि वेस्ट बर्लिन की घेराबंदी एक विकल्प है और पूर्वी जर्मनी इस योजना पर काम कर रहा है। लेकिन वे इसकी तारीख को लेकर निश्चित नहीं थे।
'ऑपरेशन पिंक'
पूर्वी जर्मनी की खुफिया एजेंसी स्टासी के एक दस्तावेज के मुताबिक, "13 अगस्त की सफल कार्रवाई का सबसे अहम सबक ये है कि किसी ऑपरेशन को खुफिया रखा जाए। ये उतना ही कारगर होता है जितना सही वक्त पर सही जगह दुश्मन पर बोला गया कामयाब हमला। एक अगस्त को ख्रुश्चेव और वॉल्टर के बीच फोन पर लंबी बात हुई जिसे कुछ साल पहले मॉस्को ने जारी किया था। शुरुआत में हल्की-फुल्की बातों के बाद दोनों ने वेस्ट बर्लिन की सुरक्षा के मुद्दे और दीवार की योजना पर बात की। 12 अगस्त को वॉल्टर ने इस योजना पर अमल के आदेश दिए। 'ऑपरेशन पिंक' पर काम शुरू हो गया था। जॉन एफ कैनेडी ने बाद में कहा भी था, "दीवार बहुत अच्छी चीज नहीं होती, लेकिन एक जंग से कहीं बेहतर विकल्प जरूर है।"