पर सब जानते हैं कि हमेशा से ऐसा नहीं था। सिर्फ 6 महीने पहले ही ट्रंप वादे कर रहे थे कि अगर उत्तर कोरिया अमेरिका को डराने की कोशिश करेगा तो अमेरिका ऐसी आग बरसाएगा जो दुनिया ने पहले कभी नहीं देखी होगी। सेजोंग संस्थान के प्रोफेसर हकसून पेक का कहना है कि धमकियों का ऐसा स्तर पहले कभी नहीं देखा था। वो कहते हैं, "राष्ट्रपति मून परमाणु युद्ध के खतरे को लेकर काफी चिंतित थे। किम जोंग-उन भी उसी स्थिति में थे। अमेरिकी सांसद लिंडसे ग्राहम जैसे लोगों से सुनने में आ रहा था कि लोगों की जानें जाएंगी। डोनाल्ड ट्रंप की अपरंपरागत और अस्थिर राजनीति ने युद्ध को लेकर दोनों कोरियाई नेताओं को चिंता में डाल दिया था।"
अमेरिका शुरू से ही कहता आया है कि
उत्तर कोरिया का परमाणु हथियार छोड़ना ही एकमात्र विकल्प है। अब तक हुई सब ताज्जुब भरी घटनाओं के बावजूद भी कुछ लोगों को लगता है कि किम इन मांगों को मानने के लिए इसलिए तैयार हो जाएंगे ताकि बाद में अगर वे इसमें कामयाब ना भी हो पाएं को फिर ट्रंप के पास क्या विकल्प बचेगा? तो क्या मून जे-इन और ट्रंप को उत्तर कोरिया ने बातों में फंसाया जिसने पहले भी दुनिया को बेवकूफ बनाया है?
फ्लेचर स्कूल ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी के प्रोफेसर ली सुंग-यून कहते हैं, "अमेरिका के सामने फिर से कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणुविहीन करने और मिसाइल परीक्षण ना करने की बात कहकर किम जोंग-उन प्रतिबंधों पर ढील चाहते हैं, अमेरिका की सैन्य कोशिशों को पहले ही टाल देना चाहते हैं और चाहते हैं कि विश्व उत्तर कोरिया को एक जायज परमाणु शक्ति की तरह स्वीकार करे।"
ट्रंप की बात की जाए तो ये एक बहुत बड़ा साहसिक और ऐतिहासिक कदम है जो किसी अमेरिकी नेता ने विदेश मामलों में उठाया है। अगर ये जुआ काम कर गया तो ट्रंप खुद को उत्तर कोरिया का मुद्दा हल करने का श्रेय दे पाएंगे। उनकी सरकार के पास दिखाने के लिए बहुत कम 'उपलब्धियां' हैं जबकि अपने मतदाताओं को बहुत कुछ बदलने का वादा करके वो सत्ता में आए थे। ट्रंप को लगता है कि उनकी अधिकतम दबाव वाली रणनीति, चीन को साइडलाइन करने की उनकी कोशिशें और उत्तर कोरिया पर आर्थिक पाबंदी लगाने की योजना काम कर रही है।
जानकार कहते हैं कि ट्रंप ने अनौपचारिक तौर पर व्हाइट हाउस में कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि किम जोंग-उन के प्रस्ताव का श्रेय उन्हें दिया जाएगा। उनके मतदाता तो देंगे ही। लेकिन किम से मिलने में एक खतरा है कि ट्रंप ऐसा कर उन्हें बराबर का दर्जा दे देंगे। ये उनकी छवि के लिए घातक भी साबित हो सकता है। मुलाकात के लिए बताए गए समय में कुछ ही दिन रह गए हैं और तब तक का वक्त उस नेता के साथ कूटनीतिक मकसद पूरा करने के लिए कम है जिसे कुछ महीने पहले ही ट्रंप ने 'नाटा रॉकेटमैन' कहा था।
दक्षिण कोरिया की बुसान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रॉबर्ट कैली ने ट्वीट किया था -"ट्रंप पढ़ाई नहीं करते हैं। वो अपनी ही स्क्रिप्ट से अलग कहीं पहुंच जाते हैं। मई का मतलब है कि स्टाफ की जरूरी तैयारियों के लिए भी वक्त ना के बराबर बचा है।" उत्तर कोरिया ये खेल दशकों से खेल रहा है। ट्रंप अभी इस खेल में नए हैं। उन्हें एक बड़ी जीत दिखाई देगी, लेकिन उनकी सौदेबाजी की कला से वो किम जोंग-उन के साथ सौदेबाजी नहीं कर पाएंगे।
मून के लिए ये मामला इतिहास से जुड़ा है और कुछ निजी भी है। इससे पहले भी वो 2007 में राष्ट्रपति रोह मू-ह्यून के प्रमुख अधिकारी के तौर पर उत्तर कोरिया के साथ समझौते की कोशिश कर चुके हैं। तब वे किम के पिता किम जोंग-इल से मिले थे। ये आखिरी बार था जब दोनों देशों के नेताओं के बीच शिखर वार्ता हुई थी। उत्तर कोरिया ने तब एक सेटेलाइट लॉंन्च किया था जिसके बाद बातचीत बंद हो गई थी।
तब तक तकरीबन साढे चार अरब डॉलर की मदद संवाद नीति के तहत उत्तर कोरिया को मिल चुकी थी। आलोचकों का कहना है कि इसी पैसे ने उत्तर कोरिया के लिए हथियार जुटाए थे। कोरिया प्रायद्वीपीय फोरम की फेलो ड्यूइअन किम का कहना है कि एक बार फेल हो चुके मून अपना अधूरा काम पूरा करना चाहते हैं। "दरअसल, वे अपने पहले के दोनों राष्ट्रपतियों के रास्ते पर ही चल रहे हैं। ये बिल्कुल वो मुद्दा है जिसे वो उठाना चाहेंगे और आगे बढ़ना चाहेंगे।"
उत्तर कोरिया से आए एक रिफ्यूजी के बेटे मून को अच्छी तरह पता है कि कोरियाई प्रायद्वीप पर युद्ध का प्रभाव क्या होगा। 1950 में कोरियाई युद्ध की शुरूआत के दौरान उनके माता-पिता हजारों शरणार्थियों के साथ यूएन के आपूर्ति जहाज में उत्तर कोरिया से भाग कर आए थे। अपने चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने पत्रकारों से कहा था, "मेरे पिता कम्युनिज्म से नफरत कर उत्तर कोरिया से भाग कर आए थे। मैं भी उत्तर कोरिया के कम्युनिस्ट सिस्टम से नफरत करता हूं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं उत्तर के लोगों को एक दमनकारी शासन भुगतने दूं।
राष्ट्रपति मून मानते हैं कि आगे बहुत-सी रूकावटें हैं। वो लोगों की उम्मीदें संभाले हुए हैं और कुछ भी गलत हो सकता है। ड्यूइअन किम मानती हैं कि 'ये हो सकता है कि समझौते की प्रक्रिया के आखिर में सब लोग फेल हो जाएं और उत्तर कोरिया फैसला करे कि वो परमाणु हथियार रखेगा। "कुछ नहीं पता है। मुझे नहीं लगता कि इसमें कभी कामयाबी मिल सकती है। तमाम आशंकाओं के बावजूद सभी पार्टियों को खुले दिमाग से बातचीत के लिए जाना चाहिए और समझौते के लिए अच्छी कोशिशें करनी चाहिए। विंटर ओलिंपिक के बाद मून की अप्रूवल रेटिंग में भी इजाफा हुआ था जब उन्होंने उत्तर की महिला हॉकी टीम को दक्षिण की टीम के साथ मिलकर खेलने दिया था।
इस बात की संभावना है कि वो फेल हो जाएंगे और इसका राजनीतिक तौर पर खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा, लेकिन ये उनके लिए सिर्फ राजनीतिक लाभ की बात नहीं है। उन्होंने पिछले साल टाइम्स पत्रिका को बताया था जब वे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे -"अपने परिवार से सिर्फ मेरी मां दक्षिण कोरिया भाग कर आई थीं। वो 90 साल की हैं। उनकी छोटी बहन अब भी उत्तर में रहती हैं। मेरी मां की आखिरी ख्वाहिश है कि वे उससे मिल पाएं।"
एक कम्युनिस्ट देश जिसके इरादों को पढ़ना मुश्किल है, उसके साथ ये बातचीत एक बड़ा जुआ खेलने जैसा है। लेकिन अगर वे इसमें कामयाब हो जाते हैं तो परमाणु युद्ध का खतरा कम हो सकता है और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार भी मिल सकता है। अगर वे फेल हुए तो फिर से खतरनाक राजनीतिक खेल में वापसी।