जाड़े की एक सुबह रिश्तेदार, पड़ोसी और ढेर सारे शुभचिंतक 10 साल के नकीबुल्लाह को देखने उसके चाचा के घर आए हैं। वो उसे जिंदा देखकर खुश हैं। नकीबुल्लाह बलूचिस्तान के मदरसे से रहस्यमयी ढंग से ग़ायब हो गए थे, जहां वह तालीम पा रहे थे।
पांच महीने तक कुछ पता नहीं चला पर एक रोज नकीबुल्लाह के पड़ोसियों ने उन्हें एक अफगान टीवी चैनल पर देखा। नकीबुल्लाह कंधार में पकड़े गए चरमपंथियों की कतार में खड़े थे।
जन्नत के नाम पर आत्मघाती
पड़ोसी अब्दुल अहद बताते हैं, "मैं दौड़कर नकीबुल्लाह के चाचा के घर गया और उन्हें बताया कि उसे पुलिस ने कंधार में आत्मघाती हमले के लिए पकड़ा है।"
नकीबुल्लाह की कहानी से पता चलता है कि तालिबान और दूसरे चरमपंथी कैसे बच्चों को आत्मघाती हमलावर के बतौर तैयार करते हैं। नकीबुल्लाह ने बताया कि उसे ले जाने वालों ने उससे कहा कि वह जन्नत जाएगा और उसकी सारी मुसीबतें खत्म हो जाएंगी।
चरमपंथियों के टारगेट पर बच्चे
अफगानों में लड़ाका बनने की गौरवपूर्ण परंपरा रही है पर आत्मघाती हमले इसका हिस्सा नहीं थे। अफगानिस्तान में खुदकुश हमलों की शुरुआत करीब 2005 में हुई। ऐसा ही कुछ इराक़ी जंग के मैदान में भी देखा गया। अफगानिस्तान में 2001 से ही तालिबान के सत्ता से बेदखल होने के बाद से लड़ाई जारी है और बच्चों को इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा है।
बच्चों का चरमपंथियों गतिविधियों में इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है। चाहे वह धमाके का काम हो या निगरानी और जासूसी। अफगान अधिकारी कहते हैं कि उन्होंने 10 साल में 250 के करीब बच्चों को चरमपंथियों गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों में गिरफ्तार किया है। मगर जो बात सबसे ज्यादा चिंताजनक है, वह यह कि बच्चों के खुदकुश बम हमले बढ़ रहे हैं।
तो बच्चे इसलिए होते हैं चरमपंथियों के टारगेट
बच्चे सिर्फ़ इसलिए भर्ती किए जा रहे हैं कि वो बच्चे हैं। अफगान सुरक्षा बलों की क्षमता बढ़ने से व्यस्क खुदकुश हमलावरों को टार्गेट पर हमला करने में मुश्किल आ रही थी। इस लिहाज से बच्चे ज्यादा कारगर लगते हैं क्योंकि उन्हें समझाना आसान होता है और सुरक्षा बल उन पर कम संदेह करते हैं।
हजारों दूसरे बच्चों की तरह नकीबुल्लाह के चाचा ने भी उन्हें उनके पिता के गुजरने के बाद मदरसे में तालीम के लिए भेजा था। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के गरीब परिवार अपने बेटों को मुफ्त पढ़ाई और रहने के लिए मदरसा भेज देते हैं।
मदरसों से होता हैं बच्चों का अपहरण
तालिबान मदरसों में तालीम ले रहे बच्चों को अपना टारगेट बनाकर अपनी गेंग में भर्ती कर ट्रैनिंग देते हैं। हिरासत में लिए गए बच्चों से बातचीत में पता चला कि उन्हें गली मोहल्लों और गरीब परिवारों से भी उठाया गया था।
कई मामलों में घरवालों का कहना था कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है। 10 साल की एक लड़की की ओर अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान तब गया जब दक्षिणी हेलमंद प्रांत से छह जनवरी 2014 को उसे हिरासत में लिया गया।
चरमपंथियों के पाकिस्तानी ठिकानों में दी जाती है ट्रैनिंग
चरमपंथी गतिविधियों के लिए लड़कियों की भर्ती के मामले बहुत कम सामने आए हैं। लड़की ने बताया था कि उसके भाई ने एक पुलिस चौकी पर उससे खुदकुश हमला करवाने की कोशिश की।
अफगान अधिकारियों के मुताबिक हिरासत में लिए गए 90 फीसदी बच्चों को ख़ुदकुश हमला करने, झूठ बोलने और उनके दिमाग में ये सब चीजें पाकिस्तान में भरी गई थीं। इस बात के भी सबूत हैं कि अफगानिस्तान के तालिबान नियंत्रित इलाकों में भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
जान देने के बदले जन्नत के ख्वाब
पिछले साल अफ़ग़ानिस्तान के कुंदुज शहर में एक पिता ने अपने किशोर बेटे को पुलिस को सौंपा था। उन्हें डर था कि बेटा चरमपंथी बन जाएगा। उनका परिवार साल भर पहले पाकिस्तान से लौटा था।
फरवरी 2011 में मर्दान शहर में स्कूल यूनीफ़ॉर्म पहने 12 साल के एक बच्चे ने खुद को उड़ा लिया था। इसमें 30 लोग मारे गए थे। एक अधिकारी का कहना था, "उन बच्चों को अपनी जान देने की एवज में जन्नत के ख्वाब दिखाए गए थे, जहां दूध और शहद की नदियां बहती हैं।"
अपनाए जाते हैं धार्मिक हथकंडे
बच्चों को यह कहकर भी उकसाने की कोशिश की गई है कि अफगान औरतों और लड़कियों का 'विदेशी हमलावर फौज' बलात्कार कर रही है और अमरीकी कुरान को जला रहे हैं। ट्रेनिंग देने वाले बच्चों को सिखाते हैं कि विदेशी सैनिकों को रोकना उनकी जिम्मेदारी है और ऐसा करने पर वो और उनके माता-पिता जन्नत जाएंगे। इन बच्चों को किसी खास निशाने के बारे में नहीं बताया जाता।
तालिबान इन आरोपों से इनकार करता है, खासकर लड़कियों की भर्ती के आरोपों से। मगर तालिबान के एक अधिकारी ने बताया कि स्थानीय कमांडरों में से किसी ने अपनी मर्ज़ी से ऐसा किया होगा।
जटिल है पुनर्वास
उनमें से कई के लिए उम्र मायने नहीं रखती। जो कोई भी यौवन की दहलीज पार कर चुका है और मानसिक रूप से स्वस्थ है, लड़ने लायक माना जाता है। अफगान सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों में 30 बच्चे अभी भी हिरासत में हैं।
उनके पुनर्वास की प्रक्रिया भी जटिल है। नकीबुल्लाह के चाचा को उनकी घर वापसी के लिए कबायली नेताओं से लेकर मौलवियों और अन अधिकारियों तक से संपर्क करना पड़ा।