किसी के कहने पर दहाड़े मार मार कर रोना कोई हंसी-खेल नहीं है, लेकिन ताइवान की ल्यू जिन लिन ऐसा हर रोज करती हैं और इसके बदले में उन्हें पैसा मिलता है।
यानी ऐसे लोगों की मौत पर शोक व मातम मनाना और रोना उनका पेशा है, जिन्हें न तो वो जानती हैं और न ही कभी उन्हें देखा है। वो ताइवान की सर्वेश्रेष्ठ पेशेवर रोने वाली यानी रुदालियों में से एक हैं। दरअसल ये ताइवान की एक बहुत पुरानी परंपरा है जो कि अब तेज़ी से खत्म हो रही है।
मातम के व्यवसायीकरण को कुछ लोग विवादास्पद मानते हैं। लेकिन ल्यू जैसे पेशेवरों का कहना है कि उनका पेशा ताइवान की एक पुरानी परंपरा है, जहां ये माना जाता है कि मृत व्यक्ति के लिए जितना ज्यादा और तेज आवाज में शोक मनाया जाएगा तो वो ‘दूसरी दुनिया’ में आसानी से चला जाएगा।
ल्यू कहती हैं कि जब आपका कोई सगा-संबंधी मरता है तो उस वक्त आप बहुत ज्यादा दुखी होते हैं, लेकिन अंतिम संस्कार होते-होते आपके आँसू भी खत्म हो चुके होते हैं।
ल्यू आगे कहती हैं कि पुराने समय में बेटियां काम के सिलसिले में दूसरे शहरों में जाती थीं और उस समय यातायात के साधन बेहद सीमित थे।
तो ऐसे में यदि उनके परिवार का कोई व्यक्ति मर जाता था तो उसके अंतिम संस्कार के लिए लोग किसी रोने वाली लड़की या महिला को किराए पर लेते थे। ऐसी लड़कियों को ‘फिलियल डॉटर’ कहते थे।
पुरानी परंपरा
ताइवान में काफी लंबी अंतिम संस्कार की परंपरा है। जिसमें दहाड़ मार कर रोने से लेकर मनोरंजन तक शामिल है।
मनोरंजन वाले हिस्से के लिए तीस वर्षीया ल्यू और उनकी साथी चमकीले कपड़े पहनती हैं और विभिन्न तरह के नृत्य करती हैं। उनका भाई मातमी संगीत बजाता है।
उसके बाद ल्यू कफन के चारों ओर घुटनों के बल रेंगती है। उसके बाद अपने भाई के वाद्य यंत्र की धुन पर वो जोर-जोर से रोती है।
इस दौरान उसकी आवाज काफी तेज रहती है। ल्यू इसके लिए घर पर बाकायदा अभ्यास करती हैं, “मेरे पिता, आपकी बेटी आपको बहुत याद करेगी, आप लौट आओ, मुझे छोड़कर न जाओ।” ये अभ्यास वो ठीक वैसे ही करते है, जैसे वास्तव में उसके पिता की मौत हो गई हो।
कैसे संभव है बनावटी शोक
मैंने ल्यू से पूछा कि आखिर वो आंखों में आंसू कैसे ले आती है। लेकिन ल्यू कहती हैं कि उनका रोना और चिल्लाना बिल्कुल वास्तविक होता है।
वो कहती हैं कि हम जिस भी मातमी परिवार में जाते हैं, उसे अपना ही परिवार समझते हैं। ऐसे में आपके अंदर वैसी ही भावना आती है।
वैसे देखने में तो ल्यू एक नर्सरी टीचर जैसी दिखती हैं, जिन्हें देखकर ये विश्वास नहीं होता कि वो एक पेशेवर शोक मनाने वाली हैं। ल्यू की मां और उनकी दादी का भी ये यही पेशा था।
निश्चित रूप से बचपन में वो उस समय उन घरों के बाहर खेलती रही होंगी जहां उनकी मां रोने के लिए जाती थीं।
लेकिन अब ये परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो रही है। इसके पीछे आर्थिक कमजोरी और अंतिम संस्कार की लंबी प्रक्रिया से लोगों का दूर होना बताया जा रहा है।
लेकिन इन सबके बावजूद ल्यू इसे जीवंत रखना चाहती हैं। ऐसा करने के लिए उन्होंने करीब बीस महिला सहायकों को रखा है जो उन्हीं की तरह ये काम करती हैं और पैसा कमाती हैं।
ये सभी लड़कियां जवान हैं, सुंदर हैं और सफेद-काले कपड़े पहनती हैं जो अंतिम संस्कार के वक्त शवों को कफन में रखने में भी सहायता करती हैं।
उत्तेजक और कोलाहलपूर्ण
-मानव वैज्ञानिक मार्क मोस्कोविज कहते हैं कि ताइवान में कुछ अंतिम संस्कारों में महिलाएं नाचने-गाने के बाद धीरे-धीरे अपने कपड़े उतार देती हैं।
-शोकाकुल लोगों के साथ कपड़े उतारने वालों के प्रदर्शन की परंपरा चीन की उत्तेजक और कोलाहलपूर्ण अंतिम संस्कार पर आधारित है।
-ताइवान में सभी समारोहों में उत्तेजक और कोलाहलपूर्ण कार्यक्रमों का चलन है। ऐसा होने पर ही कोई आयोजन सफल माना जाता है।
-पश्चिमी देशों के रॉक कंसर्ट भी उत्तेजक और कोलाहलपूर्ण आयोजन के उदाहरण हैं।
-1980 के दशक में इस तरह के आयोजन ताइवान में खूब फल-फूल रहे थे। उस समय वहां की अर्थव्यवस्था अपने चरम पर थी और लोगों के पास धार्मिक आयोजनों पर खर्च करने के लिए खूब पैसा होता था।
एली जेन्स (बीबीसी वर्ल्ड सर्विस, ताइपे)